आद्य शक्ति माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी का एक सुंदर नाम है,
‘’स्वात्मानन्दलवीभूतब्रह्माद्यानन्दसंततिः’, अर्थात्, उनके आनंद का एक सूक्ष्म अंश भी ब्रह्मा आदि देवताओं के
संयुक्त आनंद के समान है। हज़ारों वर्षों से चली आ रही इस समृद्ध परंपरा से सहज रूप से जुड़िए।
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पवित्र उत्पत्ति
ललिता सहस्रनाम साधना, माँ ललिता त्रिपुरसुंदरी की उपासना का एक अत्यंत प्रभावशाली मार्ग है। श्रीविद्या परंपरा में यह सबसे महत्वपूर्ण देवी साधना है। ललिता सहस्रनाम स्तोत्र केवल देवी के एक हज़ार नामों का संग्रह नहीं है, बल्कि इसमें देवी माँ के दिव्य स्वरूप, उनकी शक्तियों तथा साधक की आध्यात्मिक यात्रा का गूढ़ ज्ञान समाहित है।
ललिता सहस्रनाम ‘रहस्य नाम सहस्र’ के नाम से भी जाना जाता है। इसमें वर्णित प्रत्येक नाम एक शक्तिशाली मंत्र है, जो साधक को माँ के साथ गहन आध्यात्मिक संबंध स्थापित करने में सहायता करता है।
जिस प्रकार वेद अपौरुषेय हैं, अर्थात् मानव-निर्मित नहीं हैं, उसी प्रकार श्री ललिता सहस्रनाम भी अपौरुषेय है। ब्रह्माण्ड पुराण के ललितोपाख्यान के अनुसार, ललिता सहस्रनाम की रचना स्वयं वाग्देवियों ने माँ ललिता की प्रेरणा एवं आज्ञा से की थी।
ललिता सहस्रनाम में उल्लेखित माँ का एक अद्भुत नाम है, “कामाक्षी कामदायिनी”, अर्थात् देवी माँ की आँखें मात्र ही मनुष्य की सभी इच्छाओं की पूर्ति करने वाली हैं।
"ललिता सहस्रनाम का ध्यान मेरा जागृत ध्यान है। इस ध्यान के आधार पर ही देवी माँ का प्राकट्य, साक्षात्कार मेरे जीवन में संभव हुआ है। "— ओम स्वामी जी
ललिता सहस्रनाम का जप क्यों करें?
एक हज़ार नाम। माँ की कृपा के हज़ार द्वार।
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साधकों के अनुभव
ललिता सहस्रनाम साधना के माध्यम से हज़ारों साधकों ने अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन का अनुभव किया है।
ब्लॉग से
देवी उपासना के मार्ग पर चलने वाले प्रत्येक साधक के लिए ललिता सहस्रनाम, श्रीविद्या परंपरा, साधना मार्गदर्शन और आध्यात्मिक ज्ञान से संबंधित लेख।
ललिता सहस्रनाम
ललिता सहस्रनाम स्तोत्र, माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी के एक हज़ार पवित्र नामों का संग्रह है।
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श्रीविद्या
माँ ललिता, आदि पराशक्ति अर्थात् देवी माँ की सर्वोच्च अभिव्यक्तियों में से एक हैं।
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लाभ
माँ ललिता के प्रत्येक नाम में एक विशिष्ट दिव्य ऊर्जा निहित है, जो हमारे घर-परिवार को पवित्र करने, आभामंडल को शुद्ध करने तथा हमारी अंतर्निहित चेतना को जागृत करने की क्षमता रखती है।
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साधना ऐप के होम पेज पर आपको 'पुष्प' का आइकन दिखाई देगा। 'पुष्प' आइकन पर क्लिक करके प्रत्येक पूर्णिमा पर तीन दिवसीय ललिता सहस्रनाम साधना आरंभ करें।
ललिता सहस्रनाम साधना मुख्यतः दो भागों में विभाजित है—प्रातः जप और सायं यज्ञ। पूर्णिमा के दिन प्रातः साधना ऐप में 'पुष्प' आइकन पर स्पर्श करें और अपना पहला जप करें। उसी दिन संध्याकाल में अपना पहला यज्ञ करें।
पावन मार्ग
ललिता सहस्रनाम साधना के छह चरण — प्रत्येक चरण के साथ देवी माँ के दिव्य अनुभव की अनुभूति और गहन होती जाती है।
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प्रत्येक साधक के लिए
चाहे आप ललिता सहस्रनाम साधना के प्रारंभिक चरण में हों या वर्षों से माँ ललिता के उपासक हों, यह साधना आपकी आध्यात्मिक यात्रा में आपके वर्तमान स्तर के अनुरूप मार्गदर्शन प्रदान करती है। सच्चे मन से माँ को पुकारने वाले प्रत्येक साधक को वे अपनी शरण अवश्य प्रदान करती हैं।
अपनी साधना प्रारंभ करेंसामान्य प्रश्न
उत्तर. माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी श्रीविद्या परंपरा की सर्वोच्च देवी हैं। वे सौन्दर्य, करुणा और शुद्ध चेतना की साकार अभिव्यक्ति हैं। ‘ललिता’ का अर्थ है, वे देवी जो सृष्टि की रचना, पालन और संहार की दिव्य लीला का संचालन करती हैं। ‘त्रिपुर सुंदरी’ के रूप में वे तीनों लोकों की तेजस्विनी और परम सुंदरी अधिष्ठात्री मानी जाती हैं।
शाक्त परंपरा में उन्हें परम सत्य (ब्रह्म) के समतुल्य माना गया है। वे भगवान शिव और माँ शक्ति के अद्वैत स्वरूप की अभिव्यक्ति हैं तथा अपने भक्तों को जीवन में संतुलन, पूर्णता और अंततः मोक्ष की ओर मार्गदर्शन प्रदान करती हैं।
उत्तर. ललिता सहस्रनाम के पाठ के लिए ब्रह्म मुहूर्त (सूर्योदय से पूर्व का समय) अथवा प्रातःकालीन पूजा के पश्चात का समय सर्वोत्तम माना जाता है। हालांकि, फलश्रुति में समय की अपेक्षा नियमितता को अधिक महत्व दिया गया है; अर्थात् सबसे महत्वपूर्ण बात इसका प्रतिदिन अभ्यास करना है।
यदि प्रतिदिन पाठ करना संभव न हो, तो शुक्रवार, पूर्णिमा, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी और संक्रांति जैसे शुभ दिनों में इसका पाठ विशेष रूप से अनुशंसित है।
इसके अतिरिक्त, जन्म नक्षत्र के दिन भी इसका पाठ विशेष रूप से शुभ होता है। जन्म नक्षत्र, अर्थात् जब चन्द्रमा प्रत्येक माह में एक बार उस नक्षत्र में आता है, जिसमें व्यक्ति का जन्म हुआ था।
उत्तर. ललिता सहस्रनाम और ललिता त्रिशती, दोनों ही माँ ललिता त्रिपुर सुंदरी को समर्पित पवित्र स्तोत्र हैं, किन्तु उनकी संरचना, विस्तार और विषय-वस्तु में अंतर है।
ललिता सहस्रनाम में देवी के एक हज़ार नामों का वर्णन है, जो दिव्य माता के विभिन्न स्वरूपों, गुणों और ब्रह्माण्डीय भूमिकाओं का वर्णन करते हैं। यह देवी के स्वरूप को व्यापक और विस्तृत रूप से समझने का अवसर प्रदान करता है।
वहीं ललिता त्रिशती में देवी के तीन सौ नाम हैं, जो अपेक्षाकृत अधिक गूढ़ और दार्शनिक माने जाते हैं। इसमें चेतना के सूक्ष्म आयामों तथा गहन आध्यात्मिक अर्थों पर विशेष बल दिया गया है।
यद्यपि दोनों ही स्तोत्र उपासना और ध्यान के लिए अत्यंत प्रभावशाली हैं, फिर भी ललिता सहस्रनाम अधिक वर्णनात्मक और भक्तिभाव प्रधान है, जबकि ललिता त्रिशती संक्षिप्त होने के साथ-साथ अपने आध्यात्मिक प्रतीकों और गूढ़ अर्थों के कारण अधिक रहस्यमयी एवं दार्शनिक स्वरूप रखती है।
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