"सिन्दूरारुण-विग्रहं त्रि-नयनं माणिक्य-मौलि स्फुरत्’’-ध्यान श्लोक : ललिता सहस्रनाम

माँ ललिता, आदि पराशक्ति अर्थात् देवी माँ की सर्वोच्च अभिव्यक्तियों में से एक हैं। ध्यान श्लोक माँ ललिता का एक दिव्य स्वरूप प्रस्तुत करता है। यह साधक को उनके रूप का ध्यान और चिंतन करने में सहायक है।उनका वर्ण (रंग) सिंदूर के समान गहरा लाल (अरुण) तथा उदित होते सूर्य की लालिमा जैसा है। उनके तीन नेत्र हैं। वे माणिक्यों से जटित एक दिव्य मुकुट धारण करती हैं, जिस पर चंद्रमा सुशोभित है।

माँ ललिता को ‘’त्रिपुरा’’ कहा जाता है, अर्थात् वे जो तीनों लोकों पर शासन करती हैं। ललिता सहस्रनाम में उनका 684वाँ नाम 'राजराजेश्वरी' है, जिसका अर्थ है समस्त सृष्टि की महारानी। जैसा कि उनका नाम दर्शाता है, ललिता अर्थात्, "क्रीड़ा करने वाली" यानी जो लीला करती हैं। सृष्टि की रचना, पालन, और संहार उनकी दिव्य लीला का ही हिस्सा है।

माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी का प्राकट्य

जब माता सती ने अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ में अपना शरीर त्याग दिया, तब भगवान शिव गहन समाधि में लीन हो गए। फलस्वरूप, ब्रह्मांडीय व्यवस्था संकट में आ गई। देवताओं ने कामदेव (मन्मथ) को भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा। इससे भगवान शिव क्रोधित हो गए। जैसे ही उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोला, उसकी अग्नि में कामदेव जलकर भस्म हो गए।

कामदेव की पत्नी रति ने भगवान शिव से आग्रह किया कि वे कामदेव की भस्म देह पर कम से कम एक योगिक दृष्टि डालें। ज्यों ही भगवान शिव ने उस राख के ढेर पर अपनी कृपामयी दृष्टि डाली, उसमें से भांडासुर नामक राक्षस उत्पन्न हुआ। उसने देवताओं पर अत्याचार करना आरंभ कर दिया, जिससे उनके लिए गंभीर संकट उत्पन्न हो गया।

इसके पश्चात् नारदमुनि के परामर्श पर देवताओं ने देवी माँ को प्रसन्न करने के लिए एक महायज्ञ किया। यज्ञ की पवित्र अग्नि से माँ महात्रिपुरसुन्दरी प्रकट हुईं। वे अपने दिव्य रथ ‘श्रीचक्रराज’ पर विराजमान थीं। उन्होंने अपने हाथों में दिव्य अस्त्र धारण कर रखे थे। उनकी आभा हजारों उदित होते सूर्यों के समान थी। वे एक ही साथ सौन्दर्य, शक्ति, कृपा और भय का स्वरूप थीं।

अपने इस दिव्य अवतार के कारण उन्हें चिदग्निकुण्डसम्भूता (नाम 4, ललिता सहस्रनाम) तथा देवकार्यसमुद्यता (नाम 5, ललिता सहस्रनाम) कहा गया है। अर्थात् वे शुद्ध चेतना की अग्नि रूपी यज्ञकुण्ड से प्रकट हुई हैं। उनका प्राकट्य दैत्य भांडासुर के अत्याचारों का अंत करने तथा देवताओं के दिव्य कार्य को पूर्ण करने के लिए हुआ था।

उन्होंने ‘शक्तियों’ की एक दिव्य सेना का नेतृत्व करते हुए भांडासुर के किले पर आक्रमण किया। महाकामेश्वरास्त्र का प्रयोग कर माँ ललिता ने भांडासुर और उसकी सेना का विनाश किया तथा तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कराया। अंत में, परम करुणा का परिचय देते हुए उन्होंने कामदेव को पुनर्जीवित किया, जिससे प्रेम और ब्रह्मांडीय संतुलन पुनः स्थापित हो गया।

ब्रह्मांडीय शक्ति

माँ ललिता इस सकल ब्रह्मांड की सृजनात्मक शक्ति हैं। वे हम सभी के भीतर कुण्डलिनी ऊर्जा (नाम 110, ललिता सहस्रनाम) के रूप में विद्यमान हैं। जब यह शक्ति जागृत होती है, तो हम अपने भीतर असीम ऊर्जा का अनुभव करते हैं, जो रचनात्मकता के अंसख्य द्वार खोल देती है।

अपनी पुस्तक ‘कुण्डलिनी-एक अनकही कथा’ में ओम स्वामी जी लिखते हैं:

"Talent (प्रतिभा) शब्द को यदि पुनर्व्यवस्थित किया जाए, तो उससे latent (सुप्त) शब्द बनता है। हमारी प्रतिभाएँ हमारे भीतर सुप्त अवस्था में विद्यमान रहती हैं, इसलिए उन्हें पहचानने और अभिव्यक्त करने के लिए हमें उन्हें सामने लाना होता है। इसी प्रकार, कुण्डलिनी, यह आद्य शक्ति, प्रत्येक व्यक्ति में सुप्त रूप से विद्यमान है। कुण्डलिनी जागरण का मार्ग भीतर की ओर मुड़ना और अपने भावों, विचारों तथा अपने भीतर छिपी प्रतिभाओं की दुनिया पर ध्यान देना है।"(Swami Om, 2019, p.41) (Kundalini: p. 41) (Om Swami, Kundalini: An Untold Story, p.41) 2016, Jaico Books.

देवी माँ के चार प्रमुख आयुध

माँ ललिता अपनी चार भुजाओं में निम्नलिखित आयुध (दिव्य अस्त्र) धारण करती हैं:

षोडशी

दस महाविद्याओं में माँ ललिता ‘षोडशी’ कहलाती हैं। षोडशी शाश्वत यौवन का प्रतीक हैं, अर्थात् सदैव सोलह वर्ष की रहने वाली दिव्य युवती। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में सोलह की संख्या अत्यंत पवित्र मानी जाती है। यह चन्द्रमा की 16 कलाओं का प्रतीक है, जो पूर्णिमा के दिन अपनी पूर्णता को प्राप्त करती हैं। इसलिए षोडशी पूर्णता और पूर्ण प्रकाश का प्रतिनिधित्व करती हैं।

षोडशी मानव की 16 प्रकार की इच्छाओं पर भी अधिष्ठान रखती हैं, जिनमें शारीरिक, भावनात्मक, प्रेमपूर्ण तथा आध्यात्मिक आकांक्षाएँ शामिल हैं। वे साधक का मार्गदर्शन करती हैं ताकि वह इन इच्छाओं को उचित रूप से समझे, उन्हें पूर्ण करे और अंततः उनसे ऊपर उठ सके। वे मानव चेतना के 16 आयामों तथा विशुद्धि (कण्ठ) चक्र की 16 पंखुड़ियों का भी प्रतिनिधित्व करती हैं।

श्री विद्या की परंपरा

श्रीविद्या, शक्ति उपासना की एक प्रमुख आध्यात्मिक परंपरा है। इस परंपरा में माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी को साक्षात् परम ब्रह्म माना गया है। वे शुभता की मूर्त अभिव्यक्ति हैं। श्रीविद्या में 'श्री' स्वयं माँ ललिता का ही स्वरूप है। इस परंपरा में माँ ललिता को दस महाविद्याओं की सर्वोच्च अभिव्यक्ति माना गया है, और अन्य महाविद्याओं को उन्हीं का विस्तार अथवा स्वरूप समझा जाता है।

मन्थान-भैरव तंत्र में देवी को ‘भुक्ति-मुक्ति प्रदायिनी’ कहा गया है, अर्थात् वे साधक को सांसारिक सुख-समृद्धि (भुक्ति) और परम मुक्ति (मोक्ष) दोनों प्रदान करने वाली हैं।

श्रीविद्या साधना के तीन प्रमुख आधार हैं — तंत्र, मंत्र और यंत्र। तंत्र साधना की विधियों और अनुष्ठानों का मार्ग है, मंत्र देवी माँ के ध्वनि स्वरूप की अभिव्यक्ति है, और यंत्र देवी के ज्यामितीय स्वरूप का प्रतीक है। इनके माध्यम से साधक देवी माँ से उनके स्थूल (भौतिक) स्वरूप, सूक्ष्म स्वरूप (मंत्र) तथा परा (सर्वोच्च) स्वरूप (श्रीयंत्र) के द्वारा जुड़ता है और उनकी उपासना करता है।

ललिता सहस्रनाम इन सभी तत्वों का वर्णन अपने पवित्र नामों के माध्यम से करता है। इसका आरंभ माँ ललिता के दृश्य स्वरूप के वर्णन से होता है, जो साधक को उनके रूप का चिंतन करने और मन को उन पर एकाग्र करने में सहायता करता है।

ललिता त्रिपुरसुन्दरी के राजमंत्र पंचदशी मंत्र (पंद्रह अक्षरों वाला मंत्र) के गूढ़ स्वरूप का वर्णन करते हुए सहस्रनाम उसके तीन कूटों के रहस्य को भी प्रकट करता है। यह मंत्र देवी की दिव्य चेतना का ध्वनि स्वरूप है।

माँ का 89वाँ नाम ‘मूलकूटत्रयकलेवरा’ बताता है कि उनका संपूर्ण दिव्य शरीर इन तीनों कूटों से निर्मित है। वाग्भवकूट उनके मुखमंडल के रूप में, मध्यकूट उनके ऊपरी शरीर के रूप में तथा शक्तिकूट उनकी कटि के नीचे के पवित्र भाग के रूप में प्रकाशित होता है।

इसी प्रकार देवी का 996वाँ नाम ‘श्रीचक्रराजनिलया’ उनका वर्णन उस देवी के रूप में करता है, जो समस्त चक्रों के राजा श्रीचक्र में निवास करती हैं।

इन्हीं नामों और श्लोकों में हमें माँ ललिता के विविध गुणों, शक्तियों और स्वरूपों का ज्ञान प्राप्त होता है। इस प्रकार ललिता सहस्रनाम केवल एक स्तोत्र नहीं है। यह साधक को आत्मबोध और आंतरिक अनुभूति की ओर ले जाता है तथा माँ ललिताम्बिका के सूक्ष्म स्वरूप का अनुभव कराता है। उनके दिव्य सान्निध्य को अपने दैनिक जीवन में अनुभव करने का यह एक सरल और प्रभावशाली माध्यम है।

माँ ललिता के सहस्रनाम का श्रद्धापूर्वक स्मरण और सम्मान हमारी चेतना को शुद्ध करता है तथा हमारे विचारों और कर्मों को भी आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष के साधन में परिवर्तित कर देता है।