ललिता सहस्रनाम स्तोत्र, माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी के एक हज़ार पवित्र नामों का संग्रह है। दक्षिण भारत के कई घरों में ललिता सहस्रनाम का नित्य पारायण (दैनिक पाठ) दिनचर्या का अभिन्न अंग है। घरों मेें प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल नियमित रूप से इसका पाठ किया जाता है। ललिता सहस्रनाम का पाठ भक्त को देवी माँ कृपा और संरक्षण का पात्र बनाता है। यह दिव्य स्तुति माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी की महिमा का वर्णन उनके एक हजार नामों के माध्यम से करती है।
दक्षिण भारत के असंख्य घरों में ललिता सहस्रनाम का नित्य पारायण (दैनिक पाठ) दिनचर्या का अभिन्न अंग है। घरों में प्रतिदिन प्रातः और सायंकाल इसका नियमित पाठ किया जाता है। ललिता सहस्रनाम का पाठ भक्त को देवी माँ की कृपा और संरक्षण का पात्र बनाता है। यह दिव्य स्तुति माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी की महिमा का वर्णन उनके एक हज़ार नामों से करती है।
‘सहस्र’ का अर्थ है एक हज़ार और ‘नाम’ का अर्थ है नाम। इन एक हज़ार नामों को एक स्तोत्र के रूप में व्यवस्थित किया गया है, जो पारंपरिक स्तोत्र शैली का अनुसरण करता है।
शाक्त परंपरा के विशाल आध्यात्मिक सागर में देवी माँ स्वयं को अनेक स्वरूपों में प्रकट करती हैं। वे कभी सौम्य, कभी उग्र, कभी रहस्यमयी और कभी समस्त सृष्टि को अपने भीतर धारण किए हुए प्रतीत होती हैं। इन सभी स्वरूपों में दशमहाविद्याएँ ब्रह्मांडीय ज्ञान और देवी माँ की शक्ति के संपूर्ण विस्तार का प्रतिनिधित्व करती हैं।
इस गहन परंपरा के केंद्र में तीसरी महाविद्या, माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी विराजमान हैं। वे सौंदर्य, करुणा, माधुर्य और परम चेतना की दिव्य अभिव्यक्ति हैं। ललिता सहस्रनाम उनके दिव्य वैभव, आध्यात्मिक गूढ़ता और ब्रह्मांडीय स्वरूप को प्रकट करता है।
ललिता सहस्रनाम की उत्पत्ति
ललिता सहस्रनाम का वर्णन महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित ब्रह्माण्ड पुराण के उत्तर खंड के ललितोपाख्यान (ललिता माहात्म्य) के 36वें अध्याय में प्राप्त होता है। यद्यपि इसका लिखित स्वरूप पुराणों में उपलब्ध है, किंतु इस स्तोत्र की मौखिक परंपरा सहस्रों वर्षों से चली आ रही है।
ब्रह्माण्ड पुराण में वर्णन मिलता है कि भण्डासुर का वध करने के पश्चात् माँ ललिता की दिव्य सभा में इस स्तोत्र का सर्वप्रथम प्राकट्य हुआ। ललिता सहस्रनाम की रचना का विचार स्वयं देवी माँ के हृदय में उत्पन्न हुआ। देवी माँ ने वाग्देवियों (वाक् देवियों) को ऐसा स्तोत्र रचने का आदेश दिया जो उनके वास्तविक स्वरूप को प्रकट करे, ताकि भक्त इसके जप द्वारा उनकी कृपा प्राप्त कर सकें। ओम स्वामी जी ने अपनी पुस्तक, ‘’कुंडलिनी-एक अनकही कथा’’ में उल्लेख किया है-
आठों देवियाँ देवी की स्तुति करती रहीं। और यहीं, ललिता सहस्रनाम में पहली बार कुंडलिनी तथा चक्रों का वर्णन आता है। सभी ग्रंथों व संहिताओं से पूर्व यहीं सबसे पहले कुंडलिनी की चर्चा करते हुए उसे मूल ऊर्जा तथा देवी के निर्मल निराकार पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
यह स्तोत्र अपौरुषेय माना जाता है, अर्थात् इसकी उत्पत्ति किसी मानव द्वारा नहीं हुई, बल्कि यह दैवीय रूप से प्रकट हुआ है। इसलिए यह सामान्य मानवीय सीमाओं से परे है। आश्चर्य की बात यह है कि इसके एक हज़ार नामों में से कोई भी नाम दोबारा नहीं दोहराया गया है।
ललिता सहस्रनाम की गौरवशाली परंपरा का आरंभ ऋषि अगस्त्य से हुआ, जिन्होंने यह गोपनीय ज्ञान भगवान हयग्रीव से प्राप्त किया था। भगवान हयग्रीव, श्रीहरि विष्णु के अश्वमुख (घोड़े के मुख वाले) अवतार हैं, जिन्हें ज्ञान, प्रज्ञा तथा पवित्र शास्त्रों के संरक्षण का अधिष्ठाता माना जाता है।
अपनी तीर्थयात्रा के दौरान ऋषि अगस्त्य लोगों के अज्ञान और दुःख को देखकर अत्यंत व्यथित हुए। करुणावश उन्होंने कांचीपुरम् में, जहाँ देवी कामाक्षी के रूप में विराजमान हैं, श्रीहरि को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर श्रीहरि भगवान हयग्रीव के रूप में उनके समक्ष प्रकट हुए।
लोगों को आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग दिखाने के उद्देश्य से भगवान हयग्रीव ने ऋषि अगस्त्य को माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी के प्राकट्य, भांडासुर के साथ उनके युद्ध तथा श्रीपुर (देवी की दिव्य नगरी) का विस्तृत वर्णन सुनाया। यही वर्णन ललिता सहस्रनाम का पूर्व भाग (भूमिका) कहलाता है, जिसमें 51 श्लोक हैं।
फिर ऋषि अगस्त्य ने माँ के एक हज़ार नामों के उस गूढ़तम रहस्य को जानने का आग्रह किया। उनकी निश्छल भावना और अटूट भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान हयग्रीव इस रहस्य को उजागर करने के लिए हुए।
इस प्रकार दूसरा भाग ललिता सहस्रनाम का मुख्य पाठ है, जिसे मूल पाठ कहा जाता है। इसमें कुल 183 श्लोक हैं। तीसरा भाग फलश्रुति अथवा उत्तर भाग (86 श्लोक) कहलाता है, जिसमें सहस्रनाम के जप से प्राप्त होने वाले लाभों का वर्णन किया गया है।
ललिता सहस्रनाम में वर्णित प्रत्येक नाम अपने आप में एक मंत्र है। यदि माँ के केवल एक नाम का जप भी आजीवन भक्ति, श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जाए, तो यह मन को शुद्ध कर देता है। इससे अहंकार का नाश होता है, आत्मा परमात्मा के साथ एकत्व की ओर अग्रसर होती है तथा अंततः साधक मोक्ष की ओर बढ़ता है।
इस पवित्र स्तोत्र की महिमा ऐसी है कि स्वयं भगवान शिव ने माँ ललिता त्रिपुरा सुन्दरी की उपासना की। वे देवी के प्रथम और सर्वोच्च भक्त माने जाते हैं। उनके पश्चात भगवान परशुराम, भगवान कार्तिकेय, देवराज इन्द्र, चन्द्रदेव, कामदेव, भगवान कुबेरदेव, गुरु बृहस्पति, गुरु शुक्राचार्य, लोपामुद्रा, ऋषि वशिष्ठ, ऋषि पराशर, ऋषि दुर्वासा तथा महर्षि वेदव्यास जैसे अनेक महान ऋषियों और महान विभूतियों ने इस दिव्य विद्या का अभ्यास किया, इसकी पवित्र परंपरा को आगे बढ़ाया और मानवता तक पहुँचाया।
आधुनिक काल में भास्करराय, जो 18वीं शताब्दी के श्रीविद्या दार्शनिक, विद्वान तथा माँ ललिता के परम भक्त थे, ने ललिता सहस्रनाम पर प्रथम भाष्य (टीका) लिखा। उन्होंने इसकी संरचनात्मक तथा आध्यात्मिक व्यवस्था को स्पष्ट करने के लिए इस ग्रंथ को 12 खंडों (कलाओं) में विभाजित किया। प्रत्येक कला आध्यात्मिक उन्नति के एक चरण का प्रतिनिधित्व करती है। यह साधक को एक समय में 100 नामों पर क्रमिक ध्यान करने का अवसर प्रदान करती है, जिससे प्रत्येक स्तर पर उसकी समझ और अनुभूति अधिक गहन होती है।
यह हमें अनुभव कराता है कि परम शक्ति कहीं दूर नहीं, बल्कि हमारी प्रत्येक श्वास, प्रत्येक विचार और जीवन के प्रत्येक आयाम में उपस्थित है। इसलिए, सच्चे साधकों के लिए इस स्तोत्र का नियमित चिंतन अथवा जप एक ऐसी परिवर्तनकारी साधना बन जाता है, जो उन्हें देवी माँ के साथ एकत्व का अनुभव कराता है।
इस प्रकार ललिता सहस्रनाम केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक अनुभूति है, जो साधक को यह अनुभव कराती है कि माँ की दिव्य शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि में विद्यमान है।


