ललिता सहस्रनाम श्लोक
देवी माँ के पावन स्तोत्र

ललिता सहस्रनाम श्लोक एवं जप

पावन स्तोत्र

श्री ललिता सहस्रनाम स्तोत्रम्

प्रारंभिक आवाहन मंत्र एवं चयनित श्लोक, ट्रांसलिट्रेशन तथा सरल अर्थ सहित।

ध्यान श्लोक १
ॐ श्रीविद्यां शिववामभागनिलयां ह्रीङ्कारमन्त्रोज्ज्वलां श्रीचक्राङ्कित बिन्दुमध्यवसतिं श्रीमत्सभानायिकाम् । श्रीमत्षण्मुख विघ्नराजजननीं श्रीमज्जगन्मोहिनीं । मीनाक्षीं प्रणतोऽस्मि सन्ततमहं कारुण्यवारांनिधिम् ।।
—श्रीविद्यां- जो श्री विद्या का साक्षात स्वरूप हैं; शिववामभागनिलयां- जो भगवान शिव के वाम (बाएं) भाग में निवास करती हैं; ह्रीङ्कारमन्त्रोज्ज्वलां- जिनका स्वरूप 'ह्रीं' मंत्र से प्रकाशमान (उज्ज्वल) है; श्रीचक्राङ्कित बिन्दुमध्यवसतिं- जो श्री चक्र के मध्य में बिंदु के रूप में निवास करती हैं; श्रीमत्सभानायिकाम्- जो देव-सभा की पूजनीय पीठासीन देवी (नायिका) हैं; श्रीमत्षण्मुख विघ्नराजजननीं- जो षण्मुख (भगवान कार्तिकेय) और विघ्नराज (भगवान गणेश) की आदरणीय माता हैं; श्रीमज्जगन्मोहिनीं- जो संपूर्ण संसार को मोहने वाली दिव्य देवी हैं। मीनाक्षीं प्रणतोऽस्मि सन्ततमहं- मैं देवी मीनाक्षी को सदैव प्रणाम करता/करती हूँ; कारुण्यवारांनिधिम्- जो करुणा (दया) का महासागर हैं
ध्यान श्लोक २
सिन्दूरारुणविग्रहां त्रिनयनां माणिक्यमौलिस्फुरत् तारानायकशेखरां स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम् । पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं सौम्यां रत्नघटस्थ-रक्तचरणां ध्यायेत्परामम्बिकाम् ।।
अर्थ: सिन्दूरारुणविग्रहां- जिनका स्वरूप सिंदूर और उगते हुए सूर्य की छटा के समान लाल और कांतिमय है; त्रिनयनां- जिनके तीन नेत्र हैं; माणिक्यमौलिस्फुरत् तारानायकशेखरां- जिन्होंने माणिक-जड़ित दीप्तिमय मुकुट धारण किया है और जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है; स्मितमुखीमापीनवक्षोरुहाम्- जिनके मुख पर सदैव एक आकर्षक मुस्कान रहती है, और जिनका वक्षस्थल पूर्ण विकसित है (जो माँ के रूप में जगत् का पालन-पोषण करती हैं); पाणिभ्यामलिपूर्णरत्नचषकं रक्तोत्पलं विभ्रतीं- जो अपने हाथों में शहद/मकरंद से भरा हुआ रत्नों से जड़ा चषक (प्याला) और लाल कमल धारण करती हैं; सौम्यां रत्नघटस्थ-रक्तचरणां- जो सदैव करुणा और सौंदर्य का सागर हैं, और अपने सिंदूरी, शोभायमान चरण माणिकों के कलश पर रखती हैं; ध्यायेत्परामम्बिकाम्- हम उन परा-अम्बिका (सर्वोच्च परम माता) का ध्यान करते हैं
श्लोक १
ॐ श्रीमाता श्रीमहाराज्ञी श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी । चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता देवकार्य-समुद्यता ।। १ ।।
अर्थ: श्रीमाता- मंगलमयी माता (श्री, समृद्धि,पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है); श्रीमहाराज्ञी- ब्रह्मांड की सर्वोच्च साम्राज्ञी या शासक; श्रीमत्-सिंहासनेश्वरी- वे जो दिव्य और तेजस्वी सिंह के आसान पर विराजमान हैं; चिदग्नि-कुण्ड-सम्भूता- वे दिव्य शक्ति जो विशुद्ध चेतना (ज्ञान) के अग्निकुंड से प्रकट हुईं; देवकार्य-समुद्यता- जो देवताओं के कार्य या दैवी कार्यों को सिद्ध करती हैं (नाम १-५)
श्लोक २
उद्यद्भानु-सहस्राभा चतुर्बाहु-समन्विता । रागस्वरूप-पाशाढ्या क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला ।। २ ।।
अर्थ—उद्यद्भानु-सहस्राभा- जिनका तेज हज़ारों उदित होते हुए सूर्यों के समान है; चतुर्बाहु-समन्विता- जिनकी चार भुजाएँ हैं ; रागस्वरूप-पाशाढ्या- जिन्होंने इच्छा-रूपी पाश को धारण किया है; क्रोधाकाराङ्कुशोज्ज्वला- जिन्होंने क्रोध रूपी अंकुश को धारण किया है (नाम ६-९)
श्लोक ३
मनोरूपेक्षु-कोदण्डा पञ्चतन्मात्र-सायका । निजारुण-प्रभापूर-मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला ।। ३ ।।
अर्थ—मनोरूपेक्षु-कोदण्डा- जिन्होंने मन रूपी इक्षु (गन्ने) का धनुष धारण किया है; पञ्चतन्मात्र-सायका- जो पांच तन्मात्रारूपी (सूक्ष्म तत्वों) बाणों को धारण करती हैं; निजारुण-प्रभापूर मज्जद्ब्रह्माण्ड-मण्डला- जिन्होंने संपूर्ण ब्रह्मांड को अपनी अरुण आभा से नहलाया हुआ है (नाम १०-१२)
श्लोक ४
चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिकलसत्कचा । कुरुविन्दमणि-श्रेणी-कनत्कोटीर-मण्डिता ।। ४ ।।
अर्थ—चम्पकाशोक-पुन्नाग-सौगन्धिकलसत्कचा- जिनके बालों में चंपक, अशोक, पुन्नाग और सौगन्धिका के पुष्प सजे हुए हैं; कुरुविन्दमणि-श्रेणी-कनत्कोटीर-मण्डिता- जिन्होंने कुरुविन्द मणियों की पंक्तियों से सुशोभित मुकुट धारण किया है (नाम १३-१४)
श्लोक ५
अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता । मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका ।। ५ ।।
अर्थ—अष्टमीचन्द्र-विभ्राज-दलिकस्थल-शोभिता- जिनका मस्तक शुक्ल पक्ष की अष्टमी के अर्धचंद्र के समान चमक रहा है; मुखचन्द्र-कलङ्काभ-मृगनाभि-विशेषका- जिनके मस्तक पर कस्तूरी तिलक चंद्रमा के चिह्न (दाग़) के समान शाेभायमान है (नाम १५-१६)
श्लोक ६
वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका । वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना ।। ६ ।।
अर्थ—वदनस्मर-माङ्गल्य-गृहतोरण-चिल्लिका- जिनकी भवें कामदेव के महल के तोरण (द्वार) के समान हैं; वक्त्रलक्ष्मी-परीवाह-चलन्मीनाभ-लोचना- जिनका मुख सौंदर्य से परिपूर्ण है और आँखें मुख रूपी सरोवर में तैरती हुई चंचल मछलियों के समान प्रतीत होती हैं (नाम १७-१८)
श्लोक ७
नवचम्पक-पुष्पाभ-नासादण्ड-विराजिता । ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा ।। ७ ।।
अर्थ—नवचम्पक-पुष्पाभ-नासादण्ड-विराजिता- जिनकी नासिका नव-विकसित चंपक पुष्प के समान है; ताराकान्ति-तिरस्कारि-नासाभरण-भासुरा- जिनकी नाक के आभूषण की चमक तारों की रोशनी से भी अधिक है (नाम १९-२०)
श्लोक ८
कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा । ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला ।। ८।।
अर्थ—कदम्बमञ्जरी-कॢप्त-कर्णपूर-मनोहरा- जो कदम्ब के फूलों और कलियों से बने कर्णफूलों को धारण कर अत्यंत मनोहर लगती हैं; ताटङ्क-युगली-भूत-तपनोडुप-मण्डला- जिन्होंने सूर्य और चंद्रमा के तेजस्वी मंडलों को कुण्डलों के रूप में धारण किया है (नाम २१-२२)
श्लोक ९
पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः । नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा ।। ९ ।।
अर्थ— पद्मराग-शिलादर्श-परिभावि-कपोलभूः - जिनके कपोल (गाल) पद्मराग (माणिक्य) से बने दर्पणों की चमक और सुंदरता को भी परास्त कर देते हैं; नवविद्रुम-बिम्बश्री-न्यक्कारि-रदनच्छदा- जिनके होंठ मूँगे और बिम्ब फल के समान लाल हैं (नाम २३-२४)
श्लोक १०
शुद्ध-विद्याङ्कुराकार-द्विजपङ्क्ति-द्वयोज्ज्वला । कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्ष-दिगन्तरा ।। १० ।।
अर्थ—शुद्ध-विद्याङ्कुराकार-द्विजपङ्क्ति-द्वयोज्ज्वला- जिनकी दाँतों की दो पंक्तियाँ शुद्ध ज्ञान के अंकुर के समान हैं; कर्पूर-वीटिकामोद-समाकर्ष-दिगन्तरा- जिनके मुख में कर्पूर और अन्य सुगंधित मसालों से सजा ताम्बूल है जिसकी सुगंध समस्त ब्रह्मांड को आकर्षित करती है (नाम २५-२६)
श्लोक ११
निज-सल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी । मन्दस्मित-प्रभापूर-मज्जत्कामेश-मानसा ।। ११ ।।
अर्थ—निज-सल्लाप-माधुर्य-विनिर्भर्त्सित-कच्छपी- जिनकी वाणी देवी सरस्वती की वीणा—कच्छपी—से भी मधुर है; मन्दस्मित-प्रभापूर-मज्जत्कामेश-मानसा- जिनकी मंद मुस्कान की लहरों में कामेश का मन पूर्णतः निमग्न हैं (नाम २७-२८)
श्लोक १२
अनाकलित-सादृश्य-चुबुकश्री-विराजिता । कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा ।। १२ ।।
अर्थ—अनाकलित-सादृश्य-चुबुकश्री-विराजिता- जो अद्वितीय सौंदर्य वाली ठुड्डी से सुशोभित हैं; कामेश-बद्ध-माङ्गल्य-सूत्र-शोभित-कन्धरा- जिन्होंने कामेश्वर द्वारा बांधा गया मंगलसूत्र धारण किया है (नाम २९-३०)
श्लोक १३
कनकाङ्गद-केयूर-कमनीय-भुजान्विता । रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ता-फलान्विता ।। १३ ।।
अर्थ—कनकाङ्गद-केयूर-कमनीय-भुजान्विता- जिनकी सुंदर कोमल भुजाएँ स्वर्ण के बाजूबंद और आभूषणों (केयूर) से सुसज्जित हैं; रत्नग्रैवेय-चिन्ताक-लोल-मुक्ता-फलान्विता- जिनके गले में रत्नजड़ित हार सुशोभित है, जिसमें एक मोती लटकता हुआ हिल-डुल रहा है (नाम ३१-३२)
श्लोक १४
कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी । नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी ।। १४ ।।
अर्थ— कामेश्वर-प्रेमरत्न-मणि-प्रतिपण-स्तनी- जो अपने स्तनों को भगवान कामेश्वर (शिव) के अमूल्य प्रेम रत्न के बदले अर्पित करती हैं; नाभ्यालवाल-रोमालि-लता-फल-कुचद्वयी- जिनके स्तन, नाभि-रूपी क्यारी (या जड़) से शुरू होने वाली रोम-लता पर लगे दो फलों के समान हैं (नाम ३३-३४)
श्लोक १५
लक्ष्यरोम-लताधारतासमुन्नेय-मध्यमा । स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया ।। १५ ।।
अर्थ—लक्ष्यरोम-लताधारतासमुन्नेय-मध्यमा- जिनकी कमर इतनी पतली है कि उसके अस्तित्व का अनुमान केवल बालों की महीन रेखा (रोम-लता) को देखकर ही लगाया जा सकता है; स्तनभार-दलन्मध्य-पट्टबन्ध-वलित्रया- जिनके उन्नत वक्षस्थल का उनका भार उनकी पतली कमर सह नहीं पाती।परिणामस्वरूप, उनके ऊपरी शरीर में हल्का झुकाव है जिससे उनकी पतली कमर पर तीन सुंदर रेखाएँ (वलय) बनी हैं (नाम ३५-३६)
श्लोक १६
अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटीतटी । रत्न-किङ्किणिका-रम्य-रशना-दाम-भूषिता ।। १६ ।।
अर्थ—अरुणारुण-कौसुम्भ-वस्त्र-भास्वत्-कटीतटी- जिनकी कटि (कमर) उदित होते सूर्य की लालिमा की भाँति कौसुम्भ (कुसुम्भ) रंग के रेशमी वस्त्र से जगमगा रही है; रत्न-किङ्किणिका-रम्य-रशना-दाम-भूषिता- जो रत्नों और घुँघरूओं से बनी मनमोहक शृंखलाओं की स्वर्ण-करधनी धारण करती हैं (नाम ३७-३८)
श्लोक १७
कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता । माणिक्य-मकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता ।। १७ ।।
अर्थ—कामेश-ज्ञात-सौभाग्य-मार्दवोरु-द्वयान्विता- जिनकी जंघाओं की समता और कोमलता का सौंदर्य केवल कामेश्वर ही जानते हैं; माणिक्य-मकुटाकार-जानुद्वय-विराजिता- जिनके घुटने माणिक्य से बने मुकुटाकार रत्नखंडों के समान सुशोभित हैं (नाम ३९-४०)
श्लोक १८
इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका । गूढगुल्फा कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता ।। १८ ।।
अर्थ—इन्द्रगोप-परिक्षिप्त-स्मरतूणाभ-जङ्घिका- जिनकी पिंडलियाँइंद्रगोप रत्न-जड़ित कामदेव के तूणीर (बाणों के तरकश) के समान हैं (इंद्रगोप, वर्षा-काल में दिखने वाले एक सुंदर लाल मखमली कीड़े को भी कहते हैं।); गूढगुल्फा- जिनके गुल्फ (टखने) गूढ़ अर्थात् छिपे हुए हैं; कूर्मपृष्ठ-जयिष्णु-प्रपदान्विता- जिनके चरणों का अग्रभाग कछुए की पीठ के समान उभरा हुआ है (नाम ४१-४३)
श्लोक १९
नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा । पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा ।। १९ ।।
अर्थ—नख-दीधिति-संछन्न-नमज्जन-तमोगुणा- जिनके देदीप्यमान नाखूनों की कान्ति से उन्हें नमन करने वाले भक्तों का तमोगुण (अज्ञान का अंधकार) दूर हो जाता है; पदद्वय-प्रभाजाल-पराकृत-सरोरुहा- जिनके दोनों चरणों की प्रचुर प्रभा (तेज) के सामने कमल के सौंदर्य भी फीका हैं (नाम ४४-४५)
श्लोक २०
शिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा । मराली-मन्दगमना महालावण्य-शेवधिः ।। २० ।।
अर्थ—शिञ्जान-मणिमञ्जीर-मण्डित-श्री-पदाम्बुजा- जिनके चरण-कमल रत्न-जड़ित, झंकार करते मणिमय नूपुरों से सुशोभित हैं; मराली-मन्दगमना- जिनकी चाल हंसिनी के समान मंद और मनोहर है; महालावण्य-शेवधिः- जो लावण्य (सौंदर्य) की निधि (कोष) हैं (नाम ४६-४८)
श्लोक २१
सर्वारुणाऽनवद्याङ्गी सर्वाभरण-भूषिता । शिव-कामेश्वराङ्कस्था शिवा स्वाधीन-वल्लभा ।। २१ ।।
अर्थ—सर्वारुणा- जो सर्वतः अरुण आभा से दीप्त हैं; अनवद्याङ्गी- जिनके सभी अंग त्रुटिहीन हैं; सर्वाभरण-भूषिता- जो सभी प्रकार के आभूषणों से अलंकृत हैं; शिव-कामेश्वराङ्कस्था- जो शिवरूप कामेश्वर के अंक(गोद) में विराजमान हैं; शिवा- जो स्वयं समस्त मंगलमयी हैं और मंगल प्रदान करती हैं; स्वाधीन-वल्लभा- जिन्होंने अपने प्रियतम (भगवान शिव) को भी अपने अधीन कर लिया है (नाम ४९-५४)
श्लोक २२
सुमेरु-मध्य-श‍ृङ्गस्था श्रीमन्नगर-नायिका । चिन्तामणि-गृहान्तस्था पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता ।। २२ ।।
अर्थ—सुमेरु-मध्य-श‍ृङ्गस्था- जो सुमेरु पर्वत के मध्य शिखर पर निवास करती हैं; श्रीमन्नगर-नायिका- जो श्रीनगर की एकमात्र स्वामिनी और अधिष्ठात्री हैं; चिन्तामणि-गृहान्तस्था- जो चिन्तामणि रत्न से निर्मित गृह (महल) में निवास करती हैं; पञ्च-ब्रह्मासन-स्थिता- जो पञ्च-ब्रह्मों से बने आसन (सिंहासन) पर विराजमान हैं (नाम ५५-५८)
श्लोक २३
महापद्माटवी-संस्था कदम्बवन-वासिनी । सुधासागर-मध्यस्था कामाक्षी कामदायिनी ।। २३ ।।
अर्थ—महापद्माटवी-संस्था- जो महान पद्म (कमल) के वन में निवास करती हैं; कदम्बवन-वासिनी- जो कदम्ब वृक्षों के उपवन में निवास करती हैं; सुधासागर-मध्यस्था- जो सुधा (अमृत) के सागर के मध्य विराजमान हैं; कामाक्षी- जिनके नेत्र अति सुन्दर व कामना (इच्छा) जगाने वाले हैं; कामदायिनी- जो समस्त कामनाओं (इच्छाओं) को पूर्ण करती हैं (नाम ५९-६३)
श्लोक २४
देवर्षि-गण-संघात-स्तूयमानात्म-वैभवा । भण्डासुर-वधोद्युक्त-शक्तिसेना-समन्विता ।। २४ ।।
अर्थ—देवर्षि-गण-संघात-स्तूयमानात्म-वैभवा- जिनकी स्तुति देवों और ऋषियों के समूह करते हैं; भण्डासुर-वधोद्युक्त-शक्तिसेना-समन्विता- जो भण्डासुर के वध हेतु अपनी दिव्य शक्ति-सेना से साथ पूर्णतः तत्पर हैं (नाम ६४-६५)
श्लोक २५
सम्पत्करी-समारूढ़-सिन्धुर-व्रज-सेविता । अश्वारूढ़ा-अधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता ।। २५ ।।
अर्थ—सम्पत्करी-समारूढ़-सिन्धुर-व्रज-सेविता- जो देवी सम्पत्करी द्वारा संचालित गजसमूहों (हाथियों के दलों) की सेना से सेवित हैं; अश्वारूढ़ा-अधिष्ठिताश्व-कोटि-कोटिभिरावृता- जो देवी अश्वारूढ़ा द्वारा संचालित करोड़ों अश्वों की सेना से घिरी हुई हैं (नाम ६६-६७)
श्लोक २६
चक्रराज-रथारूढ़-सर्वायुध-परिष्कृता । गेयचक्र-रथारूढ़-मन्त्रिणी-परिसेविता ।। २६ ।।
अर्थ—चक्रराज-रथारूढ़-सर्वायुध-परिष्कृता- जो समस्त आयुधों से सुसज्जित चक्रराज नामक रथ पर आरूढ़ हैं; गेयचक्र-रथारूढ़-मन्त्रिणी-परिसेविता- जो गेयचक्र रथ पर आरूढ़ मन्त्रिणी (श्यामला देवी) द्वारा सेवित हैं (नाम ६८-६९)
श्लोक २७
किरिचक्र-रथारूढ़-दण्डनाथा-पुरस्कृता । ज्वाला-मालिनिकाक्षिप्त-वह्निप्राकार-मध्यगा ।। २७ ।।
अर्थ—किरिचक्र-रथारूढ़-दण्डनाथा-पुरस्कृता- जो किरिचक्र रथ पर आरूढ़ दण्डनाथा (वाराही देवी) द्वारा अग्रसर (पुरस्कृत) हैं; ज्वाला-मालिनिकाक्षिप्त-वह्निप्राकार-मध्यगा- जो ज्वालामालिनी देवी द्वारा रचित अग्नि-प्राकार (अग्नि के परकोटे) के मध्य विराजमान हैं (नाम ७०-७१)
श्लोक २८
भण्डसैन्य-वधोद्युक्त-शक्ति-विक्रम-हर्षिता । नित्या-पराक्रमाटोप-निरीक्षण-समुत्सुका ।। २८ ।।
अर्थ—भण्डसैन्य-वधोद्युक्त-शक्ति-विक्रम-हर्षिता- जो भण्डासुर की सेना के वध हेतु उद्यत शक्तियों के पराक्रम से हर्षित होती हैं; नित्या-पराक्रमाटोप-निरीक्षण-समुत्सुका- जो अपनी नित्या देवियों के नित्य पराक्रम और गर्व को देखकर उत्सुक एवं प्रसन्न होती हैं (नाम ७२-७३)
श्लोक २९
भण्डपुत्र-वधोद्युक्त-बाला-विक्रम-नन्दिता । मन्त्रिण्यम्बा-विरचित-विषङ्ग-वध-तोषिता ।। २९ ।।
अर्थ—भण्डपुत्र-वधोद्युक्त-बाला-विक्रम-नन्दिता- जो भण्डासुर के पुत्रों के वध हेतु उद्यत बाला (बाल त्रिपुरसुंदरी) देवी के पराक्रम से आनन्दित होती हैं; मन्त्रिण्यम्बा-विरचित-विषङ्ग-वध-तोषिता- जो मन्त्रिणी देवी द्वारा विषंग नामक असुर के वध से सन्तुष्ट होती हैं (नाम ७४-७५)
श्लोक ३०
विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता । कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा ।। ३० ।।
अर्थ—विशुक्र-प्राणहरण-वाराही-वीर्य-नन्दिता- जो वाराही देवी द्वारा विशुक्र के प्राणहरण (वध) से आनन्दित होती हैं; कामेश्वर-मुखालोक-कल्पित-श्रीगणेश्वरा- जिन्होंने कामेश्वर के मुख का अवलोकन कर श्रीगणेश्वर को प्रकट किया (नाम 76-77)
श्लोक ३१
महागणेश-निर्भिन्न-विघ्नयन्त्र-प्रहर्षिता । भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी ।। ३१ ।।
अर्थ—महागणेश-निर्भिन्न-विघ्नयन्त्र-प्रहर्षिता- जो महागणेश द्वारा (असुरों के) विघ्न-यन्त्रों को नष्ट किए जाने से अत्यन्त हर्षित होती हैं; भण्डासुरेन्द्र-निर्मुक्त-शस्त्र-प्रत्यस्त्र-वर्षिणी- जो भण्डासुर द्वारा छोड़े गए अस्त्रों के प्रत्युत्तर में प्रत्यस्त्रों की वर्षा करती हैं (नाम ७८-७९)
श्लोक ३२
कराङ्गुलि-नखोत्पन्न-नारायण-दशाकृतिः । महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका ।। ३२ ।।
अर्थ—कराङ्गुलि-नखोत्पन्न-नारायण-दशाकृतिः- जिनके दस नखों से दश नारायण (विष्णु के दस अवतार) की रचना हुई; महा-पाशुपतास्त्राग्नि-निर्दग्धासुर-सैनिका- जिन्होंने महान पाशुपतास्त्र की अग्नि से असुर-सेना को भस्म किया (नाम ८०-८१)
श्लोक ३३
कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका । ब्रह्मोपेन्द्र-महेन्द्रादि-देव-संस्तुत-वैभवा ।। ३३ ।।
अर्थ—कामेश्वरास्त्र-निर्दग्ध-सभण्डासुर-शून्यका- जिन्होंने कामेश्वरास्त्र से भण्डासुर की सेना और उसकी राजधानी शून्यका को नष्ट कर दिया; ब्रह्मोपेन्द्र-महेन्द्रादि-देव-संस्तुत-वैभवा- जिनके सर्वोच्च वैभव की स्तुति ब्रह्मा, विष्णु (उपेन्द्र), शिव (महेन्द्र) आदि देवगण करते हैं (नाम ८२-८३)
श्लोक ३४
हर-नेत्राग्नि-संदग्ध-काम-सञ्जीवनौषधिः । श्रीमद्वाग्भव-कूटैक-स्वरूप-मुख-पङ्कजा ।। ३४ ।।
अर्थ—हर-नेत्राग्नि-संदग्ध-काम-सञ्जीवनौषधिः जो स्वयं उन कामदेव के लिए संजीवनी औषधि बनीं, जो भगवान शिव के तीसरे नेत्र की अग्नि से भस्म हो गए थे; श्रीमद्वाग्भव-कूटैक-स्वरूप-मुख-पङ्कजा- जिनका कमलरूपी-मुख दिव्य वाग्भव कूट (पंचदशी मंत्र के अक्षरों का प्रथम समूह) का स्वरूप है (नाम ८४-८५)
श्लोक ३५
कण्ठाधः-कटि-पर्यन्त-मध्यकूट-स्वरूपिणी । शक्ति-कूटैकतापन्न-कट्यधोभाग-धारिणी ।। ३५ ।।
अर्थ—कण्ठाधः-कटि-पर्यन्त-मध्यकूट-स्वरूपिणी- जो कण्ठ से कटि-पर्यन्त मध्यकूट (पंचदशी मंत्र के मध्य के छह अक्षरों के समूह) का स्वरूप हैं; शक्ति-कूटैकतापन्न-कट्यधोभाग-धारिणी- जिनका कटि के नीचे का भाग शक्तिकूट (पंचदशी मंत्र के अन्तिम चार अक्षरों) का स्वरूप है (नाम ८६-८७)
श्लोक ३६
मूल-मन्त्रात्मिका मूल-कूटत्रय-कलेवरा । कुलामृतैक-रसिका कुलसंकेत-पालिनी ।। ३६ ।।
अर्थ—मूल-मन्त्रात्मिका- जो स्वयं मूल मंत्र (पंचदशी) स्वरूपा हैं, अर्थात्, स्वयं मूल-मंत्र की आत्मा/सार हैं; मूल-कूटत्रय-कलेवरा- जिनका शरीर पंचदशी मंत्र के तीन कूटों (भागों) से बना है; कुलामृतैक-रसिका- जो कुल के अमृत (कुलामृत) के एकमात्र रस का आस्वादन करती हैं; कुलसंकेत-पालिनी- जो कुल के गूढ़ संकेतों (रहस्यों) की रक्षा करती हैं (नाम ८८-९१)
श्लोक ३७
कुलाङ्गना कुलान्तस्था कौलिनी कुलयोगिनी । अकुला समयान्तस्था समयाचार-तत्परा ।। ३७ ।।
अर्थ—कुलाङ्गना- जो पूर्णतः कुल को समर्पित हैं; कुलान्तस्था- जो कुल के भीतर निवास करती हैं; कौलिनी- जो कौल मार्ग से संबद्ध है; कुलयोगिनी- जो कुल के योग की अधिष्ठात्री हैं; अकुला- जो कुल से परे, सब कुलों से अतीत हैं; समयान्तस्था- जो अन्तः करण में समय (आन्तरिक उपासना या समयाचार) रूप में स्थित हैं; समयाचार-तत्परा- जिन्हें समयाचार पद्धति की उपासना अत्यंत प्रिय है (नाम ९२-९८)
श्लोक ३८
मूलाधारैक-निलया ब्रह्मग्रन्थि-विभेदिनी । मणि-पूरान्तरुदिता विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी ।। ३८ ।।
अर्थ—मूलाधारैक-निलया- जो मूलाधार चक्र में निवास करती है; ब्रह्मग्रन्थि-विभेदिनी- जो ब्रह्मग्रन्थि (सृष्टि-ग्रन्थि) का भेदन करती हैं; मणि-पूरान्तरुदिता- जो मणिपूर चक्र के भीतर उदित (प्रकट) होती हैं; विष्णुग्रन्थि-विभेदिनी- जो विष्णुग्रन्थि (पालन-ग्रन्थि) का भेदन करती हैं (नाम ९९-१०२)
श्लोक ३९
आज्ञा-चक्रान्तरालस्था रुद्रग्रन्थि-विभेदिनी । सहस्राराम्बुजारूढ़ा सुधा-साराभिवर्षिणी ।। ३९ ।।
अर्थ—आज्ञा-चक्रान्तरालस्था- जो आज्ञा चक्र के मध्य में स्थित हैं; रुद्रग्रन्थि-विभेदिनी- जो रुद्रग्रन्थि (संहार-ग्रन्थि) का भेदन करती हैं; सहस्राराम्बुजारूढ़ा- जो सहस्रदल कमल (सहस्रार चक्र) पर आरूढ़ (आरोहित) होती है; सुधा-साराभिवर्षिणी- जो सुधा (अमृत) की धाराओं की वर्षा करती हैं (नाम १०३-१०६)
श्लोक ४०
तडिल्लता-समरुचिः षट्चक्रोपरि-संस्थिता । महासक्तिः कुण्डलिनी बिसतन्तु-तनीयसी ।। ४० ।।
अर्थ—तडिल्लता-समरुचिः जिनकी कान्ति तडित्-लता (विद्युत-रेखा) के समान तेज और उज्ज्वल है; षट्चक्रोपरि-संस्थिता- जो षट्चक्रों के ऊपर विराजमान हैं; महासक्तिः जो अत्यन्त आसक्त हैं (शिव के साथ पूर्ण मिलन में लीन हैं); कुण्डलिनी- जो कुण्डलिनी स्वरूपा हैं; बिसतन्तु-तनीयसी- जो कमल-नाल के रेशे (तन्तु) के समान सूक्ष्म हैं (नाम १०७-१११)
श्लोक ४१
भवानी भावनागम्या भवारण्य-कुठारिका । भद्रप्रिया भद्रमूर्तिर् भक्त-सौभाग्यदायिनी ।। ४१ ।।
अर्थ—भवानी- जो भव (शिव) को जीवन प्रदान करती हैं (उनकी पत्नी है); भावनागम्या- जो भावना (चिन्तन व समर्पित ध्यान) के द्वारा ही प्राप्त हो सकती हैं; भवारण्य-कुठारिका- जो संसार रूपी सघन वन को काटने वाली कुठार (कुल्हाड़ी) हैं; भद्रप्रिया- जिन्हें भद्र (मंगल/कल्याणकारी वस्तुएँ) प्रिय हैं; भद्रमूर्तिर्- जो मंगल (कल्याण) की साक्षात् मूर्ति हैं; भक्त-सौभाग्यदायिनी- जो अपने भक्तों को सौभाग्य का वरदान देती हैं (नाम ११२-११७)
श्लोक ४२
भक्तिप्रिया भक्तिगम्या भक्तिवश्या भयापहा । शाम्भवी शारदाराध्या शर्वाणी शर्मदायिनी ।। ४२ ।।
अर्थ—भक्तिप्रिया- जो भक्ति से प्रसन्न होती हैं; भक्तिगम्या- जो भक्ति के द्वारा प्राप्त होती हैं; भक्तिवश्या- जो केवल सच्ची भक्ति के वश में हैं, केवल उसी माध्यम से प्राप्त होती हैं; भयापहा- जो समस्त भय को दूर करती हैं; शाम्भवी- जो शम्भु की पत्नी हैं; शारदाराध्या- जो माँ शारदा (सरस्वती) द्वारा पूजित हैं; शर्वाणी- जो शर्व (भगवान शिव) की पत्नी हैं; शर्मदायिनी- जो सुख प्रदान करती हैं (नाम ११८-१२५)
श्लोक ४३
शाङ्करी श्रीकरी साध्वी शरच्चन्द्र-निभानना । शातोदरी शान्तिमती निराधारा निरञ्जना ।। ४३ ।।
अर्थ—शाङ्करी- जो कल्याण (मंगल) प्रदान करती हैं; श्रीकरी- जो धन-समृद्धि प्रदान करती हैं; साध्वी- जो एकमात्र भगवान शिव के प्रति समर्पित हैं; शरच्चन्द्र-निभानना- जिनका मुख शरद् ऋतु की निर्मल पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान उज्ज्वल है; शातोदरी- जिनका उदर अत्यन्त कृश (पतली कमर वाली) है; शान्तिमती- जो शान्ति से परिपूर्ण हैं; निराधारा- जो किसी आधार या आश्रय से रहित (स्वयं-स्थित) हैं; निरञ्जना- जो निर्मल एवं दोषों से मुक्त हैं (नाम १२६-१३३)
श्लोक ४४
निर्लेपा निर्मला नित्या निराकारा निराकुला । निर्गुणा निष्कला शान्ता निष्कामा निरुपप्लवा ।। ४४ ।।
अर्थ—निर्लेपा- जो माया, अज्ञान और सांसारिक आसक्ति रूपी मलों से रहित हैं; निर्मला- जो निर्मल हैं; नित्या- जो नित्य (शाश्वत), अनादि और अनंत हैं; निराकारा- जो आकार-रहित (निराकार) हैं; निराकुला- जो मन की व्याकुलता से सदैव मुक्त हैं; निर्गुणा- जो तीनों गुणों (सत्त्व, रजस, तमस) से परे हैं; निष्कला- जो अखण्ड (भागरहित) हैं; शान्ता- जो शान्त-स्वरूपा हैं; निष्कामा- जो समस्त कामनाओं से रहित हैं; निरुपप्लवा- जो अविनाशी हैं (नाम १३४-१४३)
श्लोक ४५
नित्यमुक्ता निर्विकारा निष्प्रपञ्चा निराश्रया । नित्यशुद्धा नित्यबुद्धा निरवद्या निरन्तरा ।। ४५ ।।
अर्थ—नित्यमुक्ता- जो सदैव मुक्त और स्वतंत्र हैं; निर्विकारा- जो परिवर्तन से परे हैं; निष्प्रपञ्चा- जो प्रपंच (इस दृश्य जगत्) से परे हैं; निराश्रया- जो किसी आश्रय की अपेक्षा नहीं रखतीं, पूर्णतः स्वतन्त्र हैं; नित्यशुद्धा- जो शाश्वत रूप से निर्मल हैं; नित्यबुद्धा- जो सदा ज्ञानमयी, प्रज्ञावान हैं; निरवद्या- जो सभी प्रकार के दोषों से रहित हैं; निरन्तरा- जो निरन्तर (शाश्वत रूप से विद्यमान) हैं (नाम १४४-१५१)
श्लोक ४६
निष्कारणा निष्कलङ्का निरुपाधिर् निरीश्वरा । नीरागा रागमथनी निर्मदा मदनाशिनी ।। ४६ ।।
अर्थ—निष्कारणा- जो कारण-रहित हैं, किसी भी कारण से प्रभावित नहीं हैं ; निष्कलङ्का- जो समस्त दोषों से रहित हैं; निरुपाधिर्- जो सभी प्रकार ही उपाधियों (सीमाओं) से परे हैं; निरीश्वरा- जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं (जिनका कोई स्वामी नहीं); नीरागा- जो राग (आसक्ति-कामना) से रहित हैं; रागमथनी- जो राग (आसक्ति) का नाश करती हैं; निर्मदा- जो मद (अहंकार) से रहित हैं; मदनाशिनी- जो मद का नाश करती हैं (नाम १५२-१५९)
श्लोक ४७
निश्चिन्ता निरहंकारा निर्मोहा मोहनाशिनी । निर्ममा ममताहन्त्री निष्पापा पापनाशिनी ।। ४७ ।।
अर्थ—निश्चिन्ता- जो चिन्ता मुक्त हैं; निरहंकारा- जो अहंकार से रहित हैं; निर्मोहा- जो मोह से रहित हैं; मोहनाशिनी- जो मोह का नाश करती हैं; निर्ममा- जो 'मेरापन' या ममत्व (स्वामित्व की भावना) से मुक्त है; ममताहन्त्री- जो ममता एवं स्वामित्व-भाव का नाश करती हैं; निष्पापा- जो पाप से रहित हैं; पापनाशिनी- जो पापों का नाश करती हैं (नाम १६०-१६७)
श्लोक ४८
निष्क्रोधा क्रोधशमनी निर्लोभा लोभनाशिनी । निस्संशया संशयघ्नी निर्भवा भवनाशिनी ।। ४८ ।।
अर्थ—निष्क्रोधा- जो क्रोध से रहित हैं; क्रोधशमनी- जो क्रोध का शमन (नाश) करती हैं; निर्लोभा- जो लोभ से रहित हैं; लोभनाशिनी- जो लोभ का नाश करती हैं; निस्संशया- जो संशय से रहित हैं; संशयघ्नी- जो समस्त संशय का नाश करती हैं; निर्भवा- जो उत्पत्ति (जन्म) से रहित हैं; भवनाशिनी- जो संसार (जन्म-मरण के चक्र) का नाश करती हैं (नाम 1१६८-१७५)
श्लोक ४९
निर्विकल्पा निराबाधा निर्भेदा भेदनाशिनी । निर्नाशा मृत्युमथनी निष्क्रिया निष्परिग्रहा ।। ४९ ।।
अर्थ—निर्विकल्पा- जो विकल्पों (मानसिक कल्पनाओं) से रहित हैं; निराबाधा- जो किसी बाधा से रहित (अविचल) हैं; निर्भेदा- जो द्वैत और समस्त भेदभाव से परे हैं; भेदनाशिनी- जो समस्त भेद (द्वैत) का नाश करती हैं; निर्नाशा- जो अविनाशी हैं; मृत्युमथनी- जो मृत्यु का नाश करती हैं; निष्क्रिया- जो सभी क्रियाओं से परे हैं; निष्परिग्रहा- जो परिग्रह (संग्रह-वृत्ति) से रहित हैं (नाम १७६-१८३)
श्लोक ५०
निस्तुला नीलचिकुरा निरपाया निरत्यया । दुर्लभा दुर्गमा दुर्गा दुःखहन्त्री सुखप्रदा ।। ५० ।।
अर्थ—निस्तुला- जो अतुलनीय (अनुपम) हैं; नीलचिकुरा- जिनके केश श्याम (नीलाभ-काले) हैं; निरपाया- जो अविनाशी हैं; निरत्यया- जिनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता; दुर्लभा- जो दुर्लभ हैं; दुर्गमा- जिन तक पहुँचना कठिन है; दुर्गा- जो संसार-सागर से पार उतारने वाली दुर्गा हैं; दुःखहन्त्री- जो दुःख का नाश करती हैं; सुखप्रदा- जो सुख प्रदान करती हैं (नाम १८४-१९२)
श्लोक ५१
दुष्टदूरा दुराचार-शमनी दोषवर्जिता । सर्वज्ञा सान्द्रकरुणा समानाधिक-वर्जिता ।। ५१ ।।
अर्थ—दुष्टदूरा- जो दुष्टों के लिए तथा अज्ञान के द्वारा अप्राप्य हैं; दुराचार-शमनी- जो दुराचार (कुरीतियों) का शमन करती हैं व पृथक बुद्धि का नाश करती हैं; दोषवर्जिता- जो समस्त दोषों से रहित हैं; सर्वज्ञा- जो सर्वज्ञ हैं; सान्द्रकरुणा- जो सान्द्र (गहन) करुणा से परिपूर्ण हैं; समानाधिक-वर्जिता- जिनके समान या जिनसे श्रेष्ठ कोई नहीं (नाम १९३-१९८)
श्लोक ५२
सर्वशक्तिमयी सर्व-मङ्गला सद्गतिप्रदा । सर्वेश्वरी सर्वमयी सर्वमन्त्र-स्वरूपिणी ।। ५२ ।।
अर्थ—सर्वशक्तिमयी- जो समस्त शक्तियों से युक्त हैं; सर्व-मङ्गला- जो समस्त मंगल की स्रोत हैं; सद्गतिप्रदा- जो सद्गति (सन्मार्ग) प्रदान करती हैं; सर्वेश्वरी- जो सबकी ईश्वरी (अधीश्वरी) हैं; सर्वमयी- जो समस्त शक्तियों का आदिस्रोत हैं; सर्वमन्त्र-स्वरूपिणी- जो समस्त मंत्रों का सार-स्वरूप हैं (नाम १९९-२०४)
श्लोक ५३
सर्व-यन्त्रात्मिका सर्व-तन्त्ररूपा मनोन्मनी । माहेश्वरी महादेवी महालक्ष्मीर् मृडप्रिया ।। ५३ ।।
अर्थ—सर्व-यन्त्रात्मिका- जो समस्त यन्त्रों की आत्मा हैं; सर्व-तन्त्ररूपा- जो समस्त तन्त्रों का स्वरूप हैं; मनोन्मनी- जो मनोन्मनी हैं (चेतना की अष्टम-अवस्था की अधिष्ठात्री जहाँ मन उन्मन—मन-से-परे—हो जाता है; माहेश्वरी- जो महेश्वर की पत्नी, उनकी सर्वोच्च शक्ति हैं; महादेवी- जो देवियों में प्रमुख हैं, जिनका स्वरूप असीम है; महालक्ष्मी:- जो महान देवी लक्ष्मी (ऐश्वर्य, धन और समृद्धि की देवी) हैं; मृडप्रिया- जो मृड (भगवान शिव) की प्रिया हैं (नाम २०५-२११)
श्लोक ५४
महारूपा महापूज्या महापातक-नाशिनी । महामाया महासत्त्वा महाशक्तिर् महारतिः ।। ५४ ।।
अर्थ—महारूपा- जिनका स्वरूप अत्यंत विराट है; महापूज्या- जो परम पूज्य एवं उपासना की चरम लक्ष्य हैं; महापातक-नाशिनी- जो महान से महान पापों का नाश करती हैं; महामाया- जो महामाया हैं; महासत्त्वा- जो महान सत्त्व (परम सत्य) हैं; महाशक्ति:- जो महाशक्ति हैं; महारतिः- जो महान आनन्द (रति) स्वरूप हैं (नाम २१२-२१८)
श्लोक ५५
महाभोगा महैश्वर्या महावीर्या महाबला । महाबुद्धिर् महासिद्धिर् महायोगेश्वरेश्वरी ।। ५५ ।।
अर्थ—महाभोगा- जो महान विस्तार-स्वरूप हैं, अथवा अपार ऐश्वर्य से युक्त हैं; महैश्वर्या- जो महान ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं; महावीर्या- जो महान वीर्य (पराक्रम) स्वरूप हैं; महाबला- जो महान बल-स्वरूप हैं; महाबुद्धि:- जो परम बुद्धि-स्वरूप हैं; महासिद्धि:- जो परम सिद्धि-स्वरूप हैं; महायोगेश्वरेश्वरी- जो महान योगियों की भी ईश्वरी हैं (नाम २१९-२२५)
श्लोक ५६
महातन्त्रा महामन्त्रा महायन्त्रा महासना । महायाग-क्रमाराध्या महाभैरव-पूजिता ।। ५६ ।।
अर्थ—महातन्त्रा- जो महान तन्त्र-स्वरूप हैं; महामन्त्रा- जो महान मन्त्र-स्वरूप हैं; महायन्त्रा- जो महान यन्त्र-स्वरूप हैं; महासना- जो समस्त ३६ तत्वों के परम आसन पर बिंदु स्वरूप में विराजमान हैं; महायाग-क्रमाराध्या- जो महायाग की क्रमपूर्वक विधि से पूजित हैं; महाभैरव-पूजिता- जो महान भैरव द्वारा पूजित हैं (नाम २२६-२३१)
श्लोक ५७
महेश्वर-महाकल्प-महाताण्डव-साक्षिणी । महाकामेश-महिषी महात्रिपुर-सुन्दरी ।। ५७ ।।
अर्थ—महेश्वर-महाकल्प-महाताण्डव-साक्षिणी- जो महेश्वर के महाकल्पकालीन महाताण्डव (महान प्रलयकालीन नृत्य) की साक्षी हैं; महाकामेश-महिषी- जो महाकामेश्वर की महिषी (पटरानी) हैं; महात्रिपुर-सुन्दरी- जो तीनों लोकों की सर्वोच्च सुन्दरी (महात्रिपुरसुन्दरी) हैं (नाम २३२-२३४)
श्लोक ५८
चतुःषष्ट्युपचाराढ्या चतुःषष्टिकलामयी । महाचतुः-षष्टिकोटि-योगिनी-गणसेविता ।। ५८ ।।
अर्थ—चतुःषष्ट्युपचाराढ्या- जो चौंसठ उपचारों से पूजित होती हैं; चतुःषष्टिकलामयी- जो चौंसठ कलाओं की साक्षात् मूर्ति हैं; महाचतुः-षष्टिकोटि-योगिनी-गणसेविता- जो चौंसठ करोड़ योगिनियों के गणों द्वारा सेवित हैं (नाम २३५-२३७)
श्लोक ५९
मनुविद्या चन्द्रविद्या चन्द्रमण्डल-मध्यगा । चारुरूपा चारुहासा चारुचन्द्र-कलाधरा ।। ५९ ।।
अर्थ—मनुविद्या- जो मनुविद्या की अधिष्ठात्री देवी हैं (मनु एक महान श्रीविद्या उपासक थे); चन्द्रविद्या- जो चन्द्रविद्या स्वरूपा हैं (चन्द्र से सम्बद्ध श्रीविद्या, चन्द्र भी एक महान श्रीविद्या उपासक थे); चन्द्रमण्डल-मध्यगा- जो चन्द्रमण्डल के मध्य में विराजमान हैं; चारुरूपा- जिनका रूप अत्यन्त मनोहर है; चारुहासा- जिनका हास्य अति सुन्दर है; चारुचन्द्र-कलाधरा- जो न घटने-बढ़ने वाली अर्धचन्द्र-कला को धारण करती हैं (नाम २३८-२४३)
श्लोक ६०
चराचर-जगन्नाथा चक्रराज-निकेतना । पार्वती पद्मनयना पद्मराग-समप्रभा ।। ६० ।।
अर्थ—चराचर-जगन्नाथा- जो चराचर (जड़-चेतन) जगत् की स्वामिनी हैं; चक्रराज-निकेतना- जो श्रीचक्र में निवास करती हैं; पार्वती- जो पर्वतराज (हिमवान) की पुत्री पार्वती हैं; पद्मनयना- जिनके नेत्र कमल-दल के समान हैं; पद्मराग-समप्रभा- जिनकी कान्ति पद्मराग (माणिक्य) के समान देदीप्यमान है (नाम २४४-२४८)
श्लोक ६१
पञ्च-प्रेतासनासीना पञ्चब्रह्म-स्वरूपिणी । चिन्मयी परमानन्दा विज्ञान-घनरूपिणी ।। ६१ ।।
अर्थ—पञ्च-प्रेतासनासीना- जो पंच-प्रेतों के आसन पर विराजमान हैं; पञ्चब्रह्म-स्वरूपिणी- जिनका स्वरूप पंच-ब्रह्मों से रचित है; चिन्मयी- जो चिन्मयी (शुद्ध चैतन्य-स्वरूपा) हैं; परमानन्दा- जो परमानन्द-स्वरूपा हैं; विज्ञान-घनरूपिणी- जो सर्वव्यापी विज्ञान (बोध) की घनीभूत मूर्ति हैं (नाम २४९-२५३)
श्लोक ६२
ध्यान-ध्यातृ-ध्येयरूपा धर्माधर्म-विवर्जिता । विश्वरूपा जागरिणी स्वपन्ती तैजसात्मिका ।। ६२ ।।
अर्थ—ध्यान-ध्यातृ-ध्येयरूपा- जो ध्यान, ध्याता और ध्येय—तीनों का स्वरूप हैं; धर्माधर्म-विवर्जिता- जो धर्म और अधर्म दोनों (नैतिक द्वैतताओं) से परे हैं; विश्वरूपा- जो विश्व-रूपा (समस्त जगत् का स्वरूप) हैं; जागरिणी- जो जाग्रत अवस्था को धारण करती हैं; स्वपन्ती- जो स्वप्न अवस्था-स्वरूपा हैं; तैजसात्मिका- जो तैजस (स्वप्नावस्था) की सूक्ष्म चेतना हैं (नाम २५४-२५९)
श्लोक ६३
सुप्ता प्राज्ञात्मिका तुर्या सर्वावस्था-विवर्जिता । सृष्टिकर्त्री ब्रह्मरूपा गोप्त्री गोविन्दरूपिणी ।। ६३ ।।
अर्थ—सुप्ता- जो सुषुप्ति (गाढ़ निद्रा) की अवस्था में विराजमान रहती हैं; प्राज्ञात्मिका- जो गहन प्रज्ञा का स्वरूप हैं; तुर्या- जो तुरीय अवस्था (साक्षी चैतन्य) में स्थित हैं; सर्वावस्था-विवर्जिता- जो इन समस्त अवस्थाओं से परे हैं; सृष्टिकर्त्री- जो सृष्टि की रचयिता हैं; ब्रह्मरूपा- जो ब्रह्मा का रूप धारण करती हैं; गोप्त्री- जो (जगत् की) रक्षा (पालन) करती हैं; गोविन्दरूपिणी- जो गोविन्द (विष्णु) का रूप धारण करती हैं (नाम २६०-२६७)
श्लोक ६४
संहारिणी रुद्ररूपा तिरोधान-करीश्वरी । सदाशिवाऽनुग्रहदा पञ्चकृत्य-परायणा ।। ६४ ।।
अर्थ—संहारिणी- जो संहार करने वाली हैं; रुद्ररूपा- जो रुद्र का रूप धारण करती हैं; तिरोधान-करी- जो जीवों को माया के आवरण में छिपाने वाली हैं (तिरोधान: छिपाना); ईश्वरी- जो ईशान की ईश्वरी (पत्नी) हैं; सदाशिवा- जो सदाशिवा, मंगल प्रदान करने वाली हैं; अनुग्रहदा- जो अनुग्रह एवं आशीर्वाद प्रदान करती हैं; पञ्चकृत्य-परायणा- जो पंच-कृत्यों—सृष्टि, पालन, संहार, तिरोधान और अनुग्रह—में तत्पर रहती हैं (नाम २६८-२७४)
श्लोक ६५
भानुमण्डल-मध्यस्था भैरवी भगमालिनी । पद्मासना भगवती पद्मनाभ-सहोदरी ।। ६५ ।।
अर्थ—भानुमण्डल-मध्यस्था- जो सूर्यमण्डल के मध्य विराजमान हैं; भैरवी- जो भैरव की पत्नी (भैरवी) हैं; भगमालिनी- जो सूर्यों की माला, अथवा छह भगों (ऐश्वर्यों) की माला धारण करती हैं; पद्मासना- जो कमल के आसन पर विराजमान हैं; भगवती- जो समस्त प्राणियों की आश्रय (भगवती) हैं; पद्मनाभ-सहोदरी- जो नाभि-कमल में निवास करती हैं तथा श्रीविष्णु की सहोदरी (बहन) हैं (नाम २७५-२८०)
श्लोक ६६
उन्मेष-निमिषोत्पन्न-विपन्न-भुवनावली । सहस्र-शीर्षवदना सहस्राक्षी सहस्रपात् ।। ६६ ।।
अर्थ—उन्मेष-निमिषोत्पन्न-विपन्न-भुवनावली- जो अपने नेत्रों के खुलने-मूँदने मात्र से लोकों की उत्पत्ति और लय कर देती हैं; सहस्र-शीर्षवदना- जिनके सहस्र शीश और मुख हैं; सहस्राक्षी- जिनके सहस्र नेत्र हैं; सहस्रपात्- जिनके सहस्र चरण हैं (नाम २८१-२८४)
श्लोक ६७
आब्रह्म-कीट-जननी वर्णाश्रम-विधायिनी । निजाज्ञारूप-निगमा पुण्यापुण्य-फलप्रदा ।। ६७ ।।
अर्थ—आब्रह्म-कीट-जननी- जो ब्रह्मा से लेकर कीट-पर्यन्त समस्त प्राणियों की जननी हैं; वर्णाश्रम-विधायिनी- जो वर्ण और आश्रम की व्यवस्था स्थापित करती हैं; निजाज्ञारूप-निगमा- जिनकी आज्ञा और निर्देश ही वेदों का स्वरूप हैं ; पुण्यापुण्य-फलप्रदा- जो पुण्य और पाप दोनों के फल प्रदान करती हैं (नाम २८५-२८८)
श्लोक ६८
श्रुति-सीमन्त-सिन्दूरी-कृत-पादाब्ज-धूलिका । सकलागम-सन्दोह-शुक्ति-सम्पुट-मौक्तिका ।। ६८ ।।
अर्थ—श्रुति-सीमन्त-सिन्दूरी-कृत-पादाब्ज-धूलिका- जिनके चरण-कमलों की धूलि श्रुतियों (वेदों) के सीमन्त (माँग) का सिन्दूर बन जाती है; सकलागम-सन्दोह-शुक्ति-सम्पुट-मौक्तिका- जो समस्त शास्त्रों के समूह रूपी सीपी के सम्पुट के भीतर स्थित मुक्ता (मोती) हैं (नाम २८९-२९०)
श्लोक ६९
पुरुषार्थप्रदा पूर्णा भोगिनी भुवनेश्वरी । अम्बिकाऽनादि-निधना हरिब्रह्मेन्द्र-सेविता ।। ६९ ।।
अर्थ—पुरुषार्थप्रदा- जो जीवन के चारों पुरुषार्थ प्रदान करती हैं; पूर्णा- जो पूर्णता-स्वरूपा, परिपूर्ण हैं; भोगिनी- जो भोक्त्री (भोग करने वाली) हैं; भुवनेश्वरी- जो भुवनों की ईश्वरी हैं; अम्बिका- जो जगत् की माता (अम्बिका) हैं; अनादि-निधना- जिनका न आदि है न अन्त; हरिब्रह्मेन्द्र-सेविता- जो विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र द्वारा सेवित हैं (नाम २९१-२९७)
श्लोक ७०
नारायणी नादरूपा नामरूप-विवर्जिता । ह्रींकारी ह्रीमती हृद्या हेयोपादेय-वर्जिता ।। ७० ।।
अर्थ—नारायणी- जो श्रीनारायण की शक्ति (नारायणी) हैं; नादरूपा- जो नाद (ध्वनि) स्वरूपा हैं; नामरूप-विवर्जिता- जो नाम और रूप से परे हैं; ह्रींकारी- जो 'ह्रीं' बीज की स्वरूपा हैं; ह्रीमती- जिन्होंने 'ह्रीं' बीज मंत्र को धारण किया हैं; हृद्या- जो हृदय में निवास करती हैं; हेयोपादेय-वर्जिता- जो न कुछ त्यागती हैं, न कुछ ग्रहण करती हैं (नाम २९८-३०४)
श्लोक ७१
राजराजार्चिता राज्ञी रम्या राजीवलोचना । रञ्जनी रमणी रस्या रणत्किङ्किणि-मेखला ।। ७१ ।।
अर्थ—राजराजार्चिता- जो राजराजेश्वर (भगवान शिव), राजाओं के भी राजा, द्वारा पूजित हैं; राज्ञी- जो सर्वोच्च शासिका, राजराजेश्वर की राज्ञी (रानी) हैं; रम्या- जो रमणीय एवं आनन्ददायिनी हैं; राजीवलोचना- जिनके नेत्र करुणामय शासक के समान, अथवा कमल के समान हैं; रञ्जनी- जो आनन्द देने वाली हैं; रमणी- जो हर्ष प्रदान करती हैं; रस्या- जो आस्वादनमयी, अथवा रस-स्वरूपा हैं; रणत्किङ्किणि-मेखला- जो झंकार करते घुँघरूओं की करधनी (मेखला) को धारण करती हैं (नाम ३०५-३१२)
श्लोक ७२
रमा राकेन्दुवदना रतिरूपा रतिप्रिया । रक्षाकरी राक्षसघ्नी रामा रमणलम्पटा ।। ७२ ।।
अर्थ—रमा- जो लक्ष्मी-स्वरूपा हैं; राकेन्दुवदना- जिनका मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान है; रतिरूपा- जो आनन्द की साक्षात मूर्ति (रति कामदेव की पत्नी का नाम भी है) हैं; रतिप्रिया- जिनको आनन्द (रति) प्रिय हैं; रक्षाकरी- जो रक्षा करने वाली हैं; राक्षसघ्नी- जो राक्षसों का संहार करती हैं; रामा- जो आनन्द-स्वरूपा हैं; रमणलम्पटा- जो भगवान शिव (रमण) के प्रति अनुरक्त हैं (नाम ३१३-३२०)
श्लोक ७३
काम्या कामकलारूपा कदम्ब-कुसुम-प्रिया । कल्याणी जगतीकन्दा करुणा-रस-सागरा ।। ७३ ।।
अर्थ—काम्या- जो परम आकांक्षा हैं; कामकलारूपा- जो कामकला (शिव और शक्ति का संयुक्त रचनात्मक ऊर्जा) का स्वरूप हैं; कदम्ब-कुसुम-प्रिया- जिनको कदम्ब के पुष्प प्रिय हैं; कल्याणी- जो कल्याण प्रदान करती हैं; जगतीकन्दा- जो जगत् की मूल (कन्द) हैं; करुणा-रस-सागरा- जो करुणा-रस की सागर हैं (नाम ३२१-३२६)
श्लोक ७४
कलावती कलालापा कान्ता कादम्बरीप्रिया । वरदा वामनयना वारुणी-मद-विह्वला ।। ७४ ।।
अर्थ—कलावती- जो समस्त कलाओं की साक्षात् मूर्ति हैं; कलालापा- जिनका आलाप संगीतमय है, अथवा जिनकी वाणी कलापूर्ण है; कान्ता- जो परम सुन्दरी (कान्ता) हैं; कादम्बरीप्रिया- जिनको कादम्बरी (मधु) प्रिय मानती है; वरदा- जो वर प्रदान करती हैं; वामनयना- जिनके नेत्र अति सुन्दर हैं; वारुणी-मद-विह्वला- जो वारुणी के मद (आनंद के अलौकिक रस) से उन्मत्त हैं (नाम ३२७-३३३)
श्लोक ७५
विश्वाधिका वेदवेद्या विन्ध्याचल-निवासिनी । विधात्री वेदजननी विष्णुमाया विलासिनी ।। ७५ ।।
अर्थ—विश्वाधिका- जो सम्पूर्ण विश्व से परे और सर्वोच्च हैं; वेदवेद्या- जो वेदों के द्वारा जानी जाती हैं; विन्ध्याचल-निवासिनी- जो विन्ध्याचल पर्वत पर निवास करती हैं; विधात्री- जो जगत् की रचना और पालन करती हैं; वेदजननी- जो वेदों की जननी हैं; विष्णुमाया- जो श्रीविष्णु की माया हैं; विलासिनी- जो लीलामयी (विलासिनी) हैं (नाम ३३४-३४०)
श्लोक ७६
क्षेत्रस्वरूपा क्षेत्रेशी क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-पालिनी । क्षयवृद्धि-विनिर्मुक्ता क्षेत्रपाल-समर्चिता ।। ७६ ।।
अर्थ—क्षेत्रस्वरूपा- जिनका स्वरूप ही क्षेत्र (प्रकृति-तत्त्व) है; क्षेत्रेशी- जो क्षेत्रेश (भगवान शिव) की पत्नी हैं; क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-पालिनी- जो क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ (शरीर और आत्मा) दोनों की रक्षिका (पालिका) हैं; क्षयवृद्धि-विनिर्मुक्ता- जो वृद्धि और क्षय से परे हैं; क्षेत्रपाल-समर्चिता- जो क्षेत्रपालों द्वारा सम्यक् रूप से पूजित हैं (नाम ३४१-३४५)
श्लोक ७७
विजया विमला वन्द्या वन्दारु-जन-वत्सला । वाग्वादिनी वामकेशी वह्निमण्डल-वासिनी ।। ७७ ।।
अर्थ—विजया- जो सदा विजयिनी हैं; विमला- जो समस्त मलों से रहित हैं; वन्द्या- जो सभी के द्वारा वनदानीय हैं; वन्दारु-जन-वत्सला- जो अपने उपासकों पर मातृवत् वात्सल्य रखती हैं; वाग्वादिनी- जो वाणी की शक्ति हैं; वामकेशी- जिनके श्याम वर्ण के केश हैं; वह्निमण्डल-वासिनी- जो अग्निमण्डल के भीतर निवास करती हैं (नाम ३४६-३५२)
श्लोक ७८
भक्तिमत्-कल्पलतिका पशुपाश-विमोचिनी । संहृताशेष-पाषण्डा सदाचार-प्रवर्तिका ।। ७८ ।।
अर्थ—भक्तिमत्-कल्पलतिका- जो भक्तों के लिए मनोकामना पूर्ण करने वाली कल्पलता हैं; पशुपाश-विमोचिनी- जो पशु-पाश (अज्ञान के बन्धन) से मुक्त करती हैं; संहृताशेष-पाषण्डा- जो भक्त के भीतर के दम्भ /पाखण्ड / मिथ्याचार का नाश करती हैं; सदाचार-प्रवर्तिका- जो सदाचार (सन्मार्ग) का प्रवर्तन करती हैं (अपनी उपस्थिति का बोध कराकर) (नाम ३५३-३५६)
श्लोक ७९
तापत्रयाग्नि-सन्तप्त-समाह्लादन-चन्द्रिका । तरुणी तापसाराध्या तनुमध्या तमोऽपहा ।। ७९ ।।
अर्थ—तापत्रयाग्नि-सन्तप्त-समाह्लादन-चन्द्रिका- जो तापत्रय की अग्नि से सन्तप्त प्राणियों को अपनी शीतल चाँदनी के समान आनंद (ह्लादन) और शांति प्रदान करती हैं; तरुणी- जो नित्य-तरुणी (सदा युवा) हैं; तापसाराध्या- जो तपस्वियों द्वारा पूजित हैं; तनुमध्या- जिनका मध्य भाग (कटि) अति कृश है; तमोऽपहा- जो तमस (अज्ञान के अंधकार) को दूर करती हैं (नाम ३५७-३६१)
श्लोक ८०
चितिस्तत्पदलक्ष्यार्था चिदेकरस-रूपिणी । स्वात्मानन्द-लवीभूत-ब्रह्माद्यानन्द-सन्ततिः ।। ८० ।।
अर्थ—चितिः- जो शुद्ध चैतन्य (चितिः) स्वरूपा हैं; तत्पद-लक्ष्यार्था- जो साक्षात् शुद्ध चेतना (ज्ञान) हैं, और वेदों में 'तत्' (वह/परमात्मा) शब्द से जो सर्वोच्च लक्ष्य बताया गया है, उसका परम स्वरूप हैं; चिदेकरस-रूपिणी- जो ज्ञान के एकमात्र रस, शुद्ध चैतन्य की स्वरूपा हैं; स्वात्मानन्द-लवीभूत-ब्रह्माद्यानन्द-सन्ततिः- जिनके आनन्द के लवमात्र (अंश) के सामने, ब्रह्मा (सृष्टिकर्ता) और अन्य देवताओं को मिलने वाला आनंद भी अत्यंत तुच्छ या एक बूंद के समान (लवीभूत) हो जाता है (नाम ३६२-३६५)
श्लोक ८१
परा प्रत्यक्चितीरूपा पश्यन्ती परदेवता । मध्यमा वैखरीरूपा भक्त-मानस-हंसिका ।। ८१ ।।
अर्थ—परा- जो चेतना की सर्वोच्च अवस्था हैं; प्रत्यक्चितीरूपा- जो अव्यक्त चैतन्य (भीतर निवास करने वाली चेतना) का स्वरूप हैं; पश्यन्ती- जो ध्वनि का द्वितीय स्तर (पश्यन्ती वाक्) हैं; परदेवता- जो पर देवता रूप में पूजित हैं; मध्यमा- जो मध्यमा वाक् हैं; वैखरीरूपा- जो वैखरी वाक् (व्यक्त ध्वनि) का स्वरूप हैं; भक्त-मानस-हंसिका- जो अपने भक्त के मन में विवेक रूपी हंसिनी हैं (नाम ३६६-३७२)
श्लोक ८२
कामेश्वर-प्राणनाड़ी कृतज्ञा कामपूजिता । श‍ृङ्गार-रस-सम्पूर्णा जया जालन्धर-स्थिता ।। ८२ ।।
अर्थ—कामेश्वर-प्राणनाड़ी- जो कामेश्वर की प्राणनाड़ी (जीवनधारा) हैं; कृतज्ञा- जो समस्त कर्मों की ज्ञाता हैं; कामपूजिता- जो कामदेव द्वारा पूजित हैं; श‍ृङ्गार-रस-सम्पूर्णा- जो शृंगार-रस से परिपूर्ण हैं; जया- जो विजय-स्वरूपा (जया) हैं; जालन्धर-स्थिता- जो जालन्धर पीठ में निवास करती हैं (नाम ३७३-३७८)
श्लोक ८३
ओड्याणपीठ-निलया बिन्दु-मण्डलवासिनी । रहोयाग-क्रमाराध्या रहस्तर्पण-तर्पिता ।। ८३ ।।
अर्थ—ओड्याणपीठ-निलया- जो ओड्याण पीठ में निवास करती हैं; बिन्दु-मण्डलवासिनी- जो (श्रीचक्र के) बिन्दु-मण्डल में निवास करती हैं; रहोयाग-क्रमाराध्या- जो यज्ञाग्नियों द्वारा गुप्त रूप से पूजित हैं; रहस्तर्पण-तर्पिता- जो गहन ध्यान में किए गए अंतर्मुखी तर्पण (आहुतियों) से तृप्त होती हैं (नाम ३७९-३८२)
श्लोक ८४
सद्यः प्रसादिनी विश्व-साक्षिणी साक्षिवर्जिता । षडङ्गदेवता-युक्ता षाड्गुण्य-परिपूरिता ।। ८४ ।।
अर्थ—सद्यः-प्रसादिनी- जो तत्काल प्रसन्न होकर कृपा प्रदान करती हैं; विश्व-साक्षिणी- जो विश्व की साक्षी हैं; साक्षिवर्जिता- जिनका कोई साक्षी नहीं; षडङ्गदेवता-युक्ता- जो षडंग देवताओं से युक्त हैं; षाड्गुण्य-परिपूरिता- जो छह दिव्य गुणों (षाड्गुण्य) से परिपूर्ण हैं (नाम ३८३-३८७)
श्लोक ८५
नित्यक्लिन्ना निरुपमा निर्वाण-सुख-दायिनी । नित्या-षोडशिका-रूपा श्रीकण्ठार्ध-शरीरिणी ।। ८५ ।।
अर्थ—नित्यक्लिन्ना- जो सदा आर्द्रहृदय (अति करुणामयी) हैं; निरुपमा- जो अनुपम (अतुलनीय) हैं; निर्वाण-सुख-दायिनी- जो निर्वाण (मोक्ष) का सुख प्रदान करती हैं; नित्या-षोडशिका-रूपा- जो सोलह नित्या देवियों के स्वरूप में हैं; श्रीकण्ठार्ध-शरीरिणी- जो श्रीकण्ठ (शिव) का अर्ध-शरीर रूप हैं (नाम ३८८-३९२)
श्लोक ८६
प्रभावती प्रभारूपा प्रसिद्धा परमेश्वरी । मूलप्रकृतिर् अव्यक्ता व्यक्ताव्यक्त-स्वरूपिणी ।। ८६ ।।
अर्थ—प्रभावती- जो प्रभा (कान्ति) से युक्त हैं; प्रभारूपा- जो प्रभा (तेज) की साक्षात् मूर्ति हैं; प्रसिद्धा- जो प्रसिद्ध (विख्यात) हैं; परमेश्वरी- जो परमेश्वरी (सर्वोच्च शासिका) हैं; मूलप्रकृति:- जो जगत् का मूल कारण (मूलप्रकृति) हैं; अव्यक्ता- जो अव्यक्त (अप्रकट) हैं; व्यक्ताव्यक्त-स्वरूपिणी- जो व्यक्त और अव्यक्त—दोनों की स्वरूपा हैं (नाम ३९३-३९९)
श्लोक ८७
व्यापिनी विविधाकारा विद्याविद्या-स्वरूपिणी । महाकामेश-नयन-कुमुदाह्लाद-कौमुदी ।। ८७ ।।
अर्थ—व्यापिनी- जो सर्वव्यापिनी हैं; विविधाकारा- जो विविध (अनेक) रूपों वाली हैं; विद्याविद्या-स्वरूपिणी- जो विद्या और अविद्या—दोनों का स्वरूप हैं; महाकामेश-नयन-कुमुदाह्लाद-कौमुदी- जो कमलनयन कामेश्वर के नेत्र रूपी कुमुद को प्रफुल्लित करने वाली चाँदनी हैं (नाम ४००-४०३)
श्लोक ८८
भक्त-हार्द-तमोभेद-भानुमद्भानु-सन्ततिः । शिवदूती शिवाराध्या शिवमूर्तिः शिवङ्करी ।। ८८ ।।
अर्थ—भक्त-हार्द-तमोभेद-भानुमद्भानु-सन्ततिः- जो अपने भक्त के हृदय से अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाली सूर्य-किरण-समूह हैं; शिवदूती- जिनके दूत स्वयं भगवान शिव हैं; शिवाराध्या- जो भगवान शिव द्वारा पूजित (आराध्या) हैं; शिवमूर्तिः- जो भगवान शिव की साक्षात् मूर्ति हैं; शिवङ्करी- जो मंगल (शिवत्व) प्रदान करती हैं (नाम ४०४-४०८)
श्लोक ८९
शिवप्रिया शिवपरा शिष्टेष्टा शिष्टपूजिता । अप्रमेया स्वप्रकाशा मनोवाचामगोचरा ।। ८९ ।।
अर्थ—शिवप्रिया- जो भगवान शिव की प्रिया हैं; शिवपरा- जो भगवान शिव से भी परे स्थित हैं; शिष्टेष्टा- जो शिष्ट (सज्जन) साधु जनों द्वारा पूजित हैं; शिष्टपूजिता- जो शिष्ट (विवेकी) जनों द्वारा पूजित हैं; अप्रमेया- जो अप्रमेय (माप से परे) हैं; स्वप्रकाशा- जो स्वयं-प्रकाश हैं; मनोवाचामगोचरा- जो मन और वाणी की पहुँच से परे हैं (नाम ४०९-४१५)
श्लोक ९०
चिच्छक्तिश् चेतनारूपा जड़शक्तिर् जड़ात्मिका । गायत्री व्याहृतिः सन्ध्या द्विजवृन्द-निषेविता ।। ९० ।।
अर्थ—चिच्छक्ति:- जो चित् की शक्ति (चिच्छक्ति) हैं; चेतनारूपा- जो शुद्ध चेतना का स्वरूप हैं; जड़शक्ति:- जो माया के पीछे की जड़-शक्ति हैं; जड़ात्मिका- जो जड़ (अचेतन) जगत् का स्वरूप हैं; गायत्री- जो मन्त्रों की जननी गायत्री हैं; व्याहृतिः- जो मन्त्रों के उच्चारण (व्याहृति) रूप हैं; सन्ध्या- जो मन्त्र, उसके अभ्यास और उसकी कृपा का सन्धि-स्वरूप (सन्ध्या) हैं; द्विजवृन्द-निषेविता- जो द्विजों (द्विजवृन्द) द्वारा पूजित हैं (नाम ४१६-४२३)
श्लोक ९१
तत्त्वासना तत्त्वमयी पञ्च-कोशान्तर-स्थिता । निःसीम-महिमा नित्य-यौवना मदशालिनी ।। ९१ ।।
अर्थ—तत्त्वासना- जो समस्त तत्त्वों की आधार-स्वरूपा (आसन) हैं; तत्- जो 'तत्' (वह परम सत्य) हैं; त्वम्- जो 'त्वम्' पद से सम्बोधित हैं; अयि- जो सबकी जननी (अयि) हैं; पञ्च-कोशान्तर-स्थिता- जो पंच-कोशों के भीतर स्थित हैं; निःसीम-महिमा- जिनकी महिमा असीम है; नित्य-यौवना- जो नित्य-यौवना (सदा युवा) हैं; मदशालिनी- जो आनन्द-मद में सुशोभित रहती हैं (नाम ४२४-४३१)
श्लोक ९२
मदघूर्णित-रक्ताक्षी मदपाटल-गण्डभूः । चन्दन-द्रव-दिग्धाङ्गी चाम्पेय-कुसुम-प्रिया ।। ९२ ।।
अर्थ—मदघूर्णित-रक्ताक्षी- जिनके मद से घूर्णित (झूमे हुए) रक्तिम नेत्र हैं; मदपाटल-गण्डभू- जिनके कपोल मद से पाटल (गुलाबी) हैं; चन्दन-द्रव-दिग्धाङ्गी- जिनका शरीर चन्दन-लेप से लिप्त है; चाम्पेय-कुसुम-प्रिया- जिन्हें चम्पक-पुष्प प्रिय हैं (नाम ४३२-४३५)
श्लोक ९३
कुशला कोमलाकारा कुरुकुल्ला कुलेश्वरी । कुलकुण्डालया कौल-मार्ग-तत्पर-सेविता ।। ९३ ।।
अर्थ—कुशला- जो कुशल (दक्ष) हैं; कोमलाकारा- जिनका स्वरूप अति कोमल है; कुरुकुल्ला- जो देवी कुरुकुल्ला हैं; कुलेश्वरी- जो कुल की ईश्वरी हैं; कुलकुण्डालया- जो कुलकुण्ड (मूलाधार चक्र) में निवास करती हैं; कौल-मार्ग-तत्पर-सेविता- जो कौल मार्ग के साधकों द्वारा पूजित हैं (नाम ४३६-४४१)
श्लोक ९४
कुमार-गणनाथाम्बा तुष्टिः पुष्टिर् मतिर् धृतिः । शान्तिः स्वस्तिमती कान्तिर् नन्दिनी विघ्ननाशिनी ।। ९४ ।।
अर्थ—कुमार-गणनाथाम्बा- जो कुमार (स्कन्द) और गणेश की माता हैं; तुष्टि:- जो सन्तोष (तुष्टि) स्वरूपा हैं; पुष्टि:- जो पोषण (पुष्टि) स्वरूपा हैं; मति:- जो बुद्धि (मति) के रूप में प्रकट होती हैं; धृति:- जो धैर्य (धृति) स्वरूपा हैं; शान्ति- जो शान्ति-स्वरूपा हैं; स्वस्तिमती- जो शाश्वत मंगल (स्वस्ति) स्वरूपा हैं; कान्ति:- जो कान्ति (तेज) स्वरूपा हैं; नन्दिनी- जो आनन्द (नन्दिनी) स्वरूपा हैं; विघ्ननाशिनी- जो विघ्नों का नाश करती हैं (नाम ४४२-४५१)
श्लोक ९५
तेजोवती त्रिनयना लोलाक्षी-कामरूपिणी । मालिनी हंसिनी माता मलयाचल-वासिनी ।। ९५ ।।
अर्थ—तेजोवती- जो तेज से परिपूर्ण हैं; त्रिनयना- जो त्रिनेत्रा हैं; लोलाक्षी-कामरूपिणी- जिनके नेत्र चंचल और प्रेमपूर्ण हैं और जो कामरूपिणी हैं; मालिनी- जो मालाएँ (मालाओं का तात्पर्य मातृका वर्णों से भी है) धारण करती हैं; हंसिनी- जो हंस-मन्त्र-स्वरूपा हैं, अथवा हंसों (योगिनियों) से अभिन्न हैं; माता- जो जगत् की माता हैं; मलयाचल-वासिनी- जो मलयाचल पर्वत पर निवास करती हैं (नाम ४५२-४५८)
श्लोक ९६
सुमुखी नलिनी सुभ्रूः शोभना सुरनायिका । कालकण्ठी कान्तिमती क्षोभिणी सूक्ष्मरूपिणी ।। ९६ ।।
अर्थ—सुमुखी- जिनका मुख अति सुन्दर है; नलिनी- जिनका शरीर कमल-दल के समान कोमल है; सुभ्रूः- जिनकी भौंहें अति सुन्दर हैं; शोभना- जो शोभायमान (देदीप्यमान) हैं; सुरनायिका- जो देवताओं की नायिका हैं; कालकण्ठी- जो भगवान शिव से अभिन्न (नीलकण्ठी) हैं; कान्तिमती- जो कान्ति से युक्त हैं; क्षोभिणी- जो मन में क्षोभ उत्पन्न करती हैं; सूक्ष्मरूपिणी- जिनका स्वरूप अति सूक्ष्म है (नाम ४५९-४६७)
श्लोक ९७
वज्रेश्वरी वामदेवी वयोऽवस्था-विवर्जिता । सिद्धेश्वरी सिद्धविद्या सिद्धमाता यशस्विनी ।। ९७ ।।
अर्थ—वज्रेश्वरी- जो षष्ठ नित्या हैं, अथवा वज्र (हीरे) के समान कान्तिमयी हैं; वामदेवी- जो भगवान शिव (वामदेव) की पत्नी हैं; वयोऽवस्था-विवर्जिता- जो जीवन की अवस्थाओं (बाल्य, यौवन, वृद्धावस्था और मृत्यु ) से रहित हैं; सिद्धेश्वरी- जो सिद्धों द्वारा पूजित हैं; सिद्धविद्या- जो सिद्धविद्या (पंचदशी मन्त्र) स्वरूपा हैं; सिद्धमाता- जो सिद्धों की माता हैं; यशस्विनी- जो यशस्विनी (कीर्तिमयी) हैं (नाम ४६८-४७४)
श्लोक ९८
विशुद्धिचक्र-निलया रक्तवर्णा त्रिलोचना । खट्वाङ्गादि-प्रहरणा वदनैक-समन्विता ।। ९८ ।।
अर्थ—विशुद्धिचक्र-निलया- जो विशुद्ध चक्र में निवास करती हैं; रक्तवर्णा- जिनका वर्ण रक्ताभ (लाल) है; त्रिलोचना- जो त्रिनेत्रा हैं; खट्वाङ्गादि-प्रहरणा- जो खट्वांग आदि आयुधों को धारण करती हैं; वदनैक-समन्विता- जिनका एक मुख है (नाम ४७५-४७९)
श्लोक ९९
पायसान्नप्रिया त्वक्स्था पशुलोक-भयङ्करी । अमृतादि-महाशक्ति-संवृता डाकिनीश्वरी ।। ९९ ।।
अर्थ—पायसान्नप्रिया- जिनको पायस (खीर) अति प्रिय है; त्वक्स्था- जो शरीर में त्वचा (त्वक्-धातु) की अधिष्ठात्री हैं; पशुलोक-भयङ्करी- जो पशुओं (अज्ञानी जनों) में भय उत्पन्न करती हैं; अमृतादि-महाशक्ति-संवृता- जो अमृत आदि महाशक्तियों से घिरी हुई हैं; डाकिनीश्वरी- जो डाकिनी (विशुद्धि चक्र की मुख्य शक्ति) की अधिष्ठात्री हैं (नाम ४८०-४८४)
श्लोक १००
अनाहताब्ज-निलया श्यामाभा वदनद्वया । दंष्ट्रोज्ज्वलाऽक्ष-मालादि-धरा रुधिरसंस्थिता ।। १०० ।।
अर्थ—अनाहताब्ज-निलया- जो अनाहत चक्र में निवास करती हैं; श्यामाभा- जिनकी कांति गहरे नीले या केल रंग की है; वदनद्वया- जिनके दो मुख हैं; दंष्ट्रोज्ज्वला- जिनकी दाढ़ें (दंष्ट्र) देदीप्यमान हैं; अक्ष-मालादि-धरा- जो अक्षमाला (रुद्राक्ष आदि की जाप माला) धारण करती हैं; रुधिरसंस्थिता- जो प्राणियों के रक्त की अधिष्ठात्री हैं (नाम ४८५-४९०)
श्लोक १०१
कालरात्र्यादि-शक्त्यौघ-वृता स्निग्धौदनप्रिया । महावीरेन्द्र-वरदा राकिण्यम्बा-स्वरूपिणी ।। १०१ ।।
अर्थ—कालरात्र्यादि-शक्त्यौघ-वृता- जो कालरात्रि आदि शक्ति-समूह से घिरी हुई हैं; स्निग्धौदनप्रिया- जिनको घृत (चिकनाई) युक्त अन्न प्रिय हैं; महावीरेन्द्र-वरदा- जो महान वीरों (महावीरेन्द्रों) को वरदान देती हैं; राकिण्यम्बा-स्वरूपिणी- जो राकिणी अम्बा (नामक चक्र-योगिनी) का स्वरूप हैं (नाम ४९१-४९४)
श्लोक १०२
मणिपूराब्ज-निलया वदनत्रय-संयुता । वज्रादिकायुधोपेता डामर्यादिभिरावृता ।। १०२ ।।
अर्थ—मणिपूराब्ज-निलया- जो मणिपूर चक्र में निवास करती हैं; वदनत्रय-संयुता- जिनके तीन मुख हैं; वज्रादिकायुधोपेता- जो वज्र आदि आयुधों से सुसज्जित हैं; डामर्यादिभिरावृता- जो डामरी आदि शक्तियों से घिरी हुई हैं (नाम ४९५-४९८)
श्लोक १०३
रक्तवर्णा मांसनिष्ठा गुडान्न-प्रीत-मानसा । समस्तभक्त-सुखदा लाकिन्यम्बा-स्वरूपिणी ।। १०३ ।।
अर्थ—रक्तवर्णा- जिनका वर्ण लाल है; मांसनिष्ठा- जो प्राणियों के शरीर में मांस (धातु) की अधिष्ठात्री हैं; गुडान्न-प्रीत-मानसा- जिनको गुड़मिश्रित अन्न अति प्रिय है; समस्तभक्त-सुखदा- जो समस्त भक्तों को सुख प्रदान करती हैं; लाकिन्यम्बा-स्वरूपिणी- जो लाकिनी अम्बा (नामक चक्र-योगिनी) का स्वरूप हैं (नाम ४९९-५०३)
श्लोक १०४
स्वाधिष्ठानाम्बुज-गता चतुर्वक्त्र-मनोहरा । शूलाद्यायुध-सम्पन्ना पीतवर्णाऽतिगर्विता ।। १०४ ।।
अर्थ—स्वाधिष्ठानाम्बुज-गता- जो स्वाधिष्ठान चक्र में निवास करती हैं; चतुर्वक्त्र-मनोहरा- जिनके चार सुन्दर मुख हैं; शूलाद्यायुध-सम्पन्ना- जो शूल आदि आयुधों से सम्पन्न हैं; पीतवर्णा- जो स्वर्ण-पीत आभा से दीप्त हैं; अतिगर्विता- जो अति गर्व से युक्त हैं (नाम ५०४-५०८)
श्लोक १०५
मेदोनिष्ठा मधुप्रीता बन्धिन्यादि-समन्विता । दध्यन्नासक्त-हृदया काकिनी-रूप-धारिणी ।। १०५ ।।
अर्थ—मेदोनिष्ठा- जो शरीर में मेद (धातु) की अधिष्ठात्री हैं; मधुप्रीता- जिन्हें मधु प्रिय है; बन्धिन्यादि-समन्विता- जो बन्धिनी आदि शक्तियों से युक्त हैं; दध्यन्नासक्त-हृदया- जिनका हृदय दधि-अन्न (दही-भात) की आहुति में अनुरक्त है; काकिनी-रूप-धारिणी- जो काकिनी (चक्र योगिनी) का स्वरूप धारण करती हैं (नाम ५०९-५१३)
श्लोक १०६
मूलाधाराम्बुजारूढ़ा पञ्च-वक्त्राऽस्थि-संस्थिता । अङ्कुशादि-प्रहरणा वरदादि-निषेविता ।। १०६ ।।
अर्थ—मूलाधाराम्बुजारूढ़ा- जो मूलाधार चक्र में निवास करती हैं; पञ्च-वक्त्रा- जिनके पाँच मुख हैं; अस्थि-संस्थिता- जो प्राणियों में अस्थि (धातु) की अधिष्ठात्री हैं; अङ्कुशादि-प्रहरणा- जो अंकुश आदि आयुधों को धारण करती हैं; वरदादि-निषेविता- जो वरदा आदि शक्तियों द्वारा सेवित हैं (नाम ५१४-५१८)
श्लोक १०७
मुद्गौदनासक्त-चित्ता साकिन्यम्बा-स्वरूपिणी । आज्ञा-चक्राब्ज-निलया शुक्लवर्णा षडानना ।। १०७ ।।
अर्थ—मुद्गौदनासक्त-चित्ता- जिनका चित्त मुद्ग (मूँग) और अन्न की आहुति में अनुरक्त है; साकिन्यम्बा-स्वरूपिणी- जो साकिनी अम्बा (नामक चक्र-योगिनी) का स्वरूप हैं; आज्ञा-चक्राब्ज-निलया- जो आज्ञा चक्र में निवास करती हैं; शुक्लवर्णा- जिनका वर्ण शुक्ल (श्वेत) है; षडानना- जिनके छह मुख हैं (नाम ५१९-५२३)
श्लोक १०८
मज्जासंस्था हंसवती-मुख्य-शक्ति-समन्विता । हरिद्रान्नैक-रसिका हाकिनी-रूप-धारिणी ।। १०८ ।।
अर्थ—मज्जासंस्था- जो शरीर में मज्जा (धातु, अस्थि मज्जा) की अधिष्ठात्री हैं; हंसवती-मुख्य-शक्ति-समन्विता- जो प्रमुख शक्ति हंसवती से युक्त हैं; हरिद्रान्नैक-रसिका- जिन्हें हरिद्रा (हल्दी) मिश्रित अन्न प्रिय हैं; हाकिनी-रूप-धारिणी- जो हाकिनी (नामक चक्र योगिनी) का स्वरूप धारण करती हैं (नाम ५२४-५२७)
श्लोक १०९
सहस्रदल-पद्मस्था सर्व-वर्णोप-शोभिता । सर्वायुधधरा शुक्ल-संस्थिता सर्वतोमुखी ।। १०९ ।।
अर्थ—सहस्रदल-पद्मस्था- जो सहस्रदल कमल (सहस्रार चक्र) में निवास करती हैं; सर्व-वर्णोप-शोभिता- जो समस्त वर्णों (रंगों) से सुशोभित हैं; सर्वायुधधरा- जो समस्त आयुधों को धारण करती हैं; शुक्ल-संस्थिता- जो शुक्र (प्रजनन धातु) की अधिष्ठात्री हैं; सर्वतोमुखी- जिनके मुख सभी दिशाओं की ओर हैं (नाम ५२८-५३२)
श्लोक ११०
सर्वौदन-प्रीतचित्ता याकिन्यम्बा-स्वरूपिणी । स्वाहा स्वधाऽमतिर् मेधा श्रुतिः स्मृतिर् अनुत्तमा ।। ११० ।।
अर्थ—सर्वौदन-प्रीतचित्ता- जिन्हें समस्त आहुतियों प्रिय हैं; याकिन्यम्बा-स्वरूपिणी- जो याकिनी अम्बा का स्वरूप हैं; स्वाहा- जो देवताओं को 'स्वाहा' सहित दी जाने वाली आहुति-स्वरूपा हैं; स्वधा- जो पितरों को 'स्वधा' सहित दी जाने वाली आहुति-स्वरूपा हैं; अमतिः- जो अविद्या (अज्ञान) के रूप में हैं; मेधा- जो मेधा (बुद्धि) के रूप में हैं; श्रुतिः- जो श्रुति (वेद) के रूप में हैं; स्मृतिः- जो स्मृति (स्मृति-ग्रन्थों) के रूप में हैं; अनुत्तमा- जो सर्वोत्तम हैं (नाम ५३३-५४१)
श्लोक १११
पुण्यकीर्तिः पुण्यलभ्या पुण्यश्रवण-कीर्तना । पुलोमजार्चिता बन्ध-मोचनी बन्धुरालका ।। १११ ।।
अर्थ—पुण्यकीर्तिः- जो पुण्य प्रदान करती हैं, जिनकी कीर्ति अत्यंत पवित्र है; पुण्यलभ्या- जो पुण्य कर्मों द्वारा प्राप्त होती हैं; पुण्यश्रवण-कीर्तना- जिनकी महिमा का श्रवण और कीर्तन सुनने मात्र से साधक पवित्र हो जाते है; पुलोमजार्चिता- जो पुलोमजा (इन्द्र की पत्नी शची) द्वारा पूजित हैं; बन्ध-मोचनी- जो (सांसारिक) बन्धन से मुक्त करती हैं; बन्धुरालका- जिनके केश सुन्दर एवं घने हैं (नाम ५४२-५४७)
श्लोक ११२
विमर्शरूपिणी विद्या वियदादि-जगत्प्रसूः । सर्वव्याधि-प्रशमनी सर्वमृत्यु-निवारिणी ।। ११२ ।।
अर्थ—विमर्शरूपिणी- जो विमर्श (आत्म-जागरूकता, विवेक और चेतना) स्वरूपा हैं; विद्या- जो विद्या (ज्ञान) स्वरूपा हैं; वियदादि-जगत्प्रसूः- जो आकाश आदि तत्त्वों सहित समस्त जगत् की जननी हैं; सर्वव्याधि-प्रशमनी- जो समस्त व्याधियों (रोगों) का शमन करती हैं; सर्वमृत्यु-निवारिणी- जो समस्त मृत्यु का निवारण करती हैं (नाम ५४८-५५२)
श्लोक ११३
अग्रगण्याऽचिन्त्यरूपा कलिकल्मष-नाशिनी । कात्यायनी कालहन्त्री कमलाक्ष-निषेविता ।। ११३ ।।
अर्थ—अग्रगण्या- जो सर्वप्रथम और सर्वोच्च हैं; अचिन्त्यरूपा- जिनका स्वरूप चिन्तन की पहुँच से परे है; कलिकल्मष-नाशिनी- जो कलियुग के पापों का नाश करती हैं; कात्यायनी- जो समस्त देवों के तेज का समूह हैं, महृषि कात्यायन की पुत्री (कात्यायनी) के रूप में अवतरित हैं; कालहन्त्री- जो मृत्यु (काल) का नाश करती हैं; कमलाक्ष-निषेविता- जो कमलनयन भगवान विष्णु द्वारा पूजित हैं (नाम ५५३-५५८)
श्लोक ११४
ताम्बूल-पूरित-मुखी दाडिमी-कुसुम-प्रभा । मृगाक्षी मोहिनी मुख्या मृडानी मित्ररूपिणी ।। ११४ ।।
अर्थ—ताम्बूल-पूरित-मुखी- जिनका मुख ताम्बूल (पान) से सुशोभित है; दाडिमी-कुसुम-प्रभा- जो अनार के पुष्प के समान आभा से युक्त हैं; मृगाक्षी- जिनके नेत्र मृगी के समान हैं; मोहिनी- जो मोहित करने वाली (मोहिनी) हैं; मुख्या- जो सर्वप्रमुख (मुख्या) हैं; मृडानी- जो मृड (भगवान शिव) की पत्नी (मृडानी) हैं; मित्ररूपिणी- जो सूर्य-स्वरूपा हैं (सूर्यदेव का एक नाम मित्र है) (नाम ५५९-५६५)
श्लोक ११५
नित्यतृप्ता भक्तनिधिर् नियन्त्री निखिलेश्वरी । मैत्र्यादि-वासनालभ्या महाप्रलय-साक्षिणी ।। ११५ ।।
अर्थ—नित्यतृप्ता- जो सदैव पूर्ण और संतुष्ट हैं; भक्तनिधि:- जो भक्तों की निधि (कोष) हैं; नियन्त्री- जो समस्त प्राणियों का नियन्त्रण एवं संचालन करती हैं; निखिलेश्वरी- जो सम्पूर्ण (सृष्टि) की ईश्वरी हैं; मैत्र्यादि-वासनालभ्या- जो मैत्री आदि सद्गुणों रूपी वासना (भावना) के द्वारा प्राप्त होती हैं; महाप्रलय-साक्षिणी- जो महाप्रलय की साक्षी हैं (नाम ५६६-५७१)
श्लोक ११६
पराशक्तिः परानिष्ठा प्रज्ञानघन-रूपिणी । माध्वीपानालसा मत्ता मातृका-वर्ण-रूपिणी ।। ११६ ।।
अर्थ—पराशक्तिः- जो परा शक्ति (सर्वोच्च शक्ति) हैं; परानिष्ठा- जो परम निष्ठा (परम लक्ष्य) हैं; प्रज्ञानघन-रूपिणी- जो घनीभूत शुद्ध प्रज्ञान (बोध) का स्वरूप हैं; माध्वीपानालसा- जो माध्वी (मधु) के पान से मन्द एवं आनन्दमग्न अवस्था में हैं; मत्ता- जो (आनन्द में) मत्त हैं; मातृका-वर्ण-रूपिणी- जो मातृका वर्णों (संस्कृत अक्षरों) और मंत्र ध्वनियों के रूप में व्याप्त हैं (नाम ५७२-५७७)
श्लोक ११७
महाकैलास-निलया मृणाल-मृदु-दोर्लता । महनीया दयामूर्तिर् महासाम्राज्य-शालिनी ।। ११७ ।।
अर्थ—महाकैलास-निलया- जो महाकैलास में निवास करती हैं; मृणाल-मृदु-दोर्लता- जिनकी भुजाएँ कमल-नाल के समान कोमल हैं; महनीया- जो परम पूज्य और वंदनीय हैं; दयामूर्ति:- जो दया की साक्षात् मूर्ति हैं; महासाम्राज्य-शालिनी- जो समस्त लोकों की साम्राज्ञी हैं (नाम ५७८-५८२)
श्लोक ११८
आत्मविद्या महाविद्या श्रीविद्या कामसेविता । श्री-षोडशाक्षरी-विद्या त्रिकूटा कामकोटिका ।। ११८ ।।
अर्थ—आत्मविद्या- जो आत्मज्ञान स्वरूपा हैं; महाविद्या- जो परम प्रज्ञा, महाविद्या स्वरूपा हैं; श्रीविद्या- जो श्रीविद्या (पंचदशी मंत्र) स्वरूपा हैं; कामसेविता- जो कामदेव द्वारा पूजित हैं; श्री-षोडशाक्षरी-विद्या- जो श्री-षोडशाक्षरी (सोलह अक्षरों के मन्त्र) विद्या-स्वरूपा हैं; त्रिकूटा- जो तीन कूटों (त्रिकूट) की स्वरूपा हैं; कामकोटिका- जो भगवान शिव स्वरूपा हैं (नाम ५८३-५८९)
श्लोक ११९
कटाक्ष-किङ्करी-भूत-कमला-कोटि-सेविता । शिरः स्थिता चन्द्रनिभा भालस्थेन्द्र-धनुः प्रभा ।। ११९ ।।
अर्थ—कटाक्ष-किङ्करी-भूत-कमला-कोटि-सेविता- जिनकी एक तिरछी दृष्टि (कटाक्ष) के प्रभाव से करोड़ों लक्ष्मियाँ उनकी दासियाँ (किंकरी) बनकर उनकी सेवा करती हैं; शिरः-स्थिता- जो सहस्रार में निवास करती हैं; चन्द्रनिभा- जो चन्द्रमा के समान आभा वाली हैं; भालस्था- जो भाल (ललाट) में, आज्ञा चक्र में निवास करती हैं; इन्द्र-धनुः-प्रभा- जो इन्द्रधनुष के समान देदीप्यमान हैं (नाम ५९०-९९४)
श्लोक १२०
हृदयस्था रविप्रख्या त्रिकोणान्तर-दीपिका । दाक्षायणी दैत्यहन्त्री दक्षयज्ञ-विनाशिनी ।। १२० ।।
अर्थ—हृदयस्था- जो हृदय (अनाहत चक्र) में निवास करती हैं; रविप्रख्या- जो सूर्य के समान प्रकाशमान हैं; त्रिकोणान्तर-दीपिका- जो त्रिकोण के भीतर की ज्योति (दीपिका) हैं; दाक्षायणी- जो दक्ष की पुत्री (सती) हैं; दैत्यहन्त्री- जो दैत्यों का संहार करती हैं; दक्षयज्ञ-विनाशिनी- जिन्होंने दक्ष के यज्ञ का विनाश किया (नाम ५९५-६००)
श्लोक १२१
दरान्दोलित-दीर्घाक्षी दर-हासोज्ज्वलन्-मुखी । गुरुमूर्तिर् गुणनिधिर् गोमाता गुहजन्मभूः ।। १२१ ।।
अर्थ—दरान्दोलित-दीर्घाक्षी- जिनके बड़े नेत्र (चंचल, हिलते डुलते) सब कुछ देखते हैं; दर-हासोज्ज्वलन्-मुखी- जिनका मुख मन्द मुस्कान से देदीप्यमान है; गुरुमूर्ति:- जो साक्षात गुरु स्वरूपा हैं; गुणनिधि:- जो गुणों की निधि (कोष) हैं; गोमाता- जो इच्छापूरक कामधेनु (गौओं की माता) स्वरूपा हैं; गुहजन्मभूः- जो गुह (कार्तिकेय) की जननी हैं, जो जगत् की दिव्य उत्पत्ति का रहस्य धारण करती हैं (नाम ६०१-६०६)
श्लोक १२२
देवेशी दण्डनीतिस्था दहराकाश-रूपिणी । प्रतिपन्मुख्य-राकान्त-तिथि-मण्डल-पूजिता ।। १२२ ।।
अर्थ—देवेशी- जो देवों की ईश्वरी (देवेशी) हैं; दण्डनीतिस्था- जो दण्डनीति (न्याय की व्यवस्था) की संचालिका हैं; दहराकाश-रूपिणी- जो समस्त प्राणियों के हृदय रूपी आकाश में सूक्ष्म रूप से विद्यमान हैं; प्रतिपन्मुख्य-राकान्त-तिथि-मण्डल-पूजिता- जो प्रतिपदा से पूर्णिमा तक की तिथियों के मण्डल में नित्य पूजित होती हैं (नाम ६०७-६१०)
श्लोक १२३
कलात्मिका कलानाथा काव्यालाप-विनोदिनी । सचामर-रमा-वाणी-सव्य-दक्षिण-सेविता ।। १२३ ।।
अर्थ—कलात्मिका- जो समस्त कलाओं की स्रोत हैं; कलानाथा- जो समस्त कलाओं की स्वामिनी हैं; काव्यालाप-विनोदिनी- जो काव्य रचना, कविता पाठ से आनंदित होती हैं; सचामर-रमा-वाणी-सव्य-दक्षिण-सेविता- जिनके बायीं ओर लक्ष्मी और दायीं ओर सरस्वती चँवर (हवा करने का साधन) लेकर उनकी सेवा कर रही हैं (नाम ६११-६१४)
श्लोक १२४
आदिशक्तिर् अमेयात्मा परमा पावनाकृतिः । अनेककोटि-ब्रह्माण्ड-जननी दिव्यविग्रहा ।। १२४ ।।
अर्थ—आदिशक्तिः- जो आदिशक्ति (मूल शक्ति) हैं; अमेया- जो अप्रमेय (माप से परे) हैं; आत्मा- जो सबमें व्याप्त आत्मा हैं; परमा- जो परम (सर्वोच्च) हैं; पावनाकृति- जो स्वरूप परम पवित्र है; अनेककोटि-ब्रह्माण्ड-जननी- जो असंख्य कोटि ब्रह्माण्डों की जननी हैं; दिव्यविग्रहा- जिनका शरीर दिव्य या अलौकिक है (नाम ६१५-६२१)
श्लोक १२५
क्लींकारी केवला गुह्या कैवल्य-पददायिनी । त्रिपुरा त्रिजगद्वन्द्या त्रिमूर्तिस् त्रिदशेश्वरी ।। १२५ ।।
अर्थ—क्लींकारी- जो क्लीं-बीज का नाद करने वाली हैं; उसकी पवित्र शक्ति हैं; केवला- जो अद्वितीय, पूर्ण (निरपेक्ष एवं निर्गुण) हैं; गुह्या- जो स्वरूप और स्वभाव में अत्यंत गोपनीय हैं; कैवल्य-पददायिनी- जो कैवल्य (मोक्ष) पद प्रदान करती हैं; त्रिपुरा- जो त्रिपुर (तीनों लोकों व चेतना की तीन अवस्थाओं) में पूजित हैं; त्रिजगद्वन्द्या- जो तीनों लोकों द्वारा वन्दनीय हैं; त्रिमूर्ति:- जो त्रिमूर्ति-स्वरूपा हैं; त्रिदशेश्वरी- जो त्रिदशों (देवताओं) की ईश्वरी हैं (नाम ६२२-६२९)
श्लोक १२६
त्र्यक्षरी दिव्य-गन्धाढ्या सिन्दूर-तिलकाञ्चिता । उमा शैलेन्द्रतनया गौरी गन्धर्व-सेविता ।। १२६ ।।
अर्थ—त्र्यक्षरी- जिनका स्वरूप तीन अक्षरों से बना है; दिव्य-गन्धाढ्या- जो दिव्य सुगन्ध से सम्पन्न हैं; सिन्दूर-तिलकाञ्चिता- जो सिन्दूर के तिलक से सुशोभित हैं; उमा- जो उमा (माँ पार्वती) हैं; शैलेन्द्रतनया- जो हिमालय (शैलेन्द्र: पर्वतराज) की पुत्री हैं; गौरी- जिनका वर्ण गोरा है; गन्धर्व-सेविता- जो गन्धर्वों (दिव्य गायक गणों) द्वारा सेवित हैं (नाम ६३०-६३६)
श्लोक १२७
विश्वगर्भा स्वर्णगर्भाऽवरदा वागधीश्वरी । ध्यानगम्याऽपरिच्छेद्या ज्ञानदा ज्ञानविग्रहा ।। १२७ ।।
अर्थ— विश्वगर्भा- जिनके गर्भ में समस्त विश्व समाहित है; स्वर्णगर्भा- जिनका गर्भ हिरण्यगर्भ है (जिसमें ब्रह्मांड का सारा प्रकाश निहित है); अवरदा- जो अधर्मियों का नाश करती हैं; वागधीश्वरी- जो वाणी की अधीश्वरी हैं; ध्यानगम्या- जो ध्यान और एकाग्र मन से प्राप्त की जा सकती हैं; अपरिच्छेद्या- जो अपरिच्छेद्य (असीम या अपार) हैं; ज्ञानदा- जो ज्ञान प्रदान करती हैं; ज्ञानविग्रहा- जो ज्ञान की साक्षात् मूर्ति हैं (नाम ६३७-६४४)
श्लोक १२८
सर्ववेदान्त-संवेद्या सत्यानन्द-स्वरूपिणी । लोपामुद्रार्चिता लीला-कॢप्त-ब्रह्माण्ड-मण्डला ।। १२८ ।।
अर्थ— सर्ववेदान्त-संवेद्या- जिन्हें समस्त वेदान्त जानते हैं; सत्यानन्द-स्वरूपिणी- जो सत्य और आनन्द की मूर्ति हैं; लोपामुद्रार्चिता- जो लोपामुद्रा (श्रीविद्या की परमाचार्य) द्वारा पूजित हैं; लीला-कॢप्त-ब्रह्माण्ड-मण्डला- जो लीला-मात्र से ब्रह्माण्ड-मण्डल की रचना और संचालन करती हैं (नाम ६४५-६४८)
श्लोक १२९
अदृश्या दृश्यरहिता विज्ञात्री वेद्यवर्जिता । योगिनी योगदा योग्या योगानन्दा युगन्धरा ।। १२९ ।।
अर्थ— अदृश्या- जो अदृश्य हैं; दृश्यरहिता- जो दृश्य से परे हैं; विज्ञात्री- जो भौतिक जगत् से परे सत्य की ज्ञाता, एकमात्र द्रष्टा हैं; वेद्यवर्जिता- जिनके लिए जानने को कुछ भी शेष नहीं (क्योंकि वे स्वयं ज्ञान की परम स्रोत हैं); योगिनी- जो भगवान शिव के साथ एकत्व में है; योगदा- जो योग प्रदान करती हैं; योग्या- जो समस्त योग की सर्वोच्च लक्ष्य हैं; योगानन्दा- जो शिव-शक्ति के मिलन में अनुभूत आनन्द (योगानन्द) स्वरूपा हैं; युगन्धरा- जो युगों को धारण करने वाली शक्ति हैं (नाम ६४९-६५७)
श्लोक १३०
इच्छाशक्ति-ज्ञानशक्ति-क्रियाशक्ति-स्वरूपिणी । सर्वाधारा सुप्रतिष्ठा सदसद्रूप-धारिणी ।। १३० ।।
अर्थ—इच्छाशक्ति-ज्ञानशक्ति-क्रियाशक्ति-स्वरूपिणी- जो इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का साकर रूप हैं; सर्वाधारा- जो सभी का आधार हैं; सुप्रतिष्ठा- जो दृढ़ता से स्थापित हैं; सदसद्रूप-धारिणी- जो सत् और असत्, दोनों रूपों को धारण करती हैं (नाम ६५८-६६१)
श्लोक १३१
अष्टमूर्तिर्-अजाजैत्री लोकयात्रा-विधायिनी । एकाकिनी भूमरूपा निर्द्वैता द्वैतवर्जिता ।। १३१ ।।
अर्थ—अष्टमूर्ति:- जिनके आठ रूप (अष्टमूर्ति) हैं; अजाजैत्री- जो अज्ञान पर विजय प्राप्त करती हैं; लोकयात्रा-विधायिनी- जो लोकों की गति (व्यवस्था) का संचालन करती हैं; एकाकिनी- जो अकेली, अद्वितीय, और स्वयं में स्थित हैं; भूमरूपा- जो ब्रह्मांड में विद्यमान समस्त वस्तुओं को समाहित किए हुए हैं और उनका मूल सार (अर्थात, भूमा-ब्रह्म स्वरूप) हैं; निर्द्वैता- जो द्वैत से रहित हैं; द्वैतवर्जिता- जो द्वैत से परे हैं (नाम ६६२-६६८)
श्लोक १३२
अन्नदा वसुदा वृद्धा ब्रह्मात्मैक्य-स्वरूपिणी । बृहती ब्राह्मणी ब्राह्मी ब्रह्मानन्दा बलिप्रिया ।। १३२ ।।
अर्थ—अन्नदा- जो अन्न (पोषण) प्रदान करने वाली हैं; वसुदा- जो समृद्धि (वसु) प्रदान करने वाली हैं; वृद्धा- जो सबसे प्राचीन, आदि या पुरातन हैं; ब्रह्मात्मैक्य-स्वरूपिणी- जो ब्रह्म स्वरूप जीवात्मा की एकता का स्वरूप है; बृहती- जो विशाल या असीम हैं; ब्राह्मणी- जो भगवान शिव (ब्राह्मण) की पत्नी हैं; ब्राह्मी- जो वाणी की अधिष्ठात्री, परब्रह्म का स्त्री-रूप हैं; ब्रह्मानन्दा- जो शाश्वत आनन्द (ब्रह्म के आनंद) का स्वरूप हैं; बलिप्रिया- जिन्हें भक्तों द्वारा अर्पित किए गए भोग, उपहार या बलिदान (आहुति) प्रिय हैं (नाम ६६९-६७७)
श्लोक १३३
भाषारूपा बृहत्सेना भावाभाव-विवर्जिता । सुखाराध्या शुभकरी शोभना सुलभा गतिः ।। १३३ ।।
अर्थ—भाषारूपा- जो भाषा (वाणी) का स्वरूप हैं; बृहत्सेना- जिनकी सेना विशाल और अनंत है; भावाभाव-विवर्जिता- जो भाव और अभाव (अस्तित्व और अनस्तित्व) दोनों से परे हैं; सुखाराध्या- जिनकी आराधना भक्त सरलता से कर सकते हैं; शुभकरी- जो मंगल (शुभ) करने वाली हैं; शोभना-सुलभागतिः जो मंगल की ओर ले जाने वाला सुगम मार्ग हैं (नाम ६७८-६८३)
श्लोक १३४
राज-राजेश्वरी राज्य-दायिनी राज्य-वल्लभा । राजत्कृपा राजपीठ-निवेशित-निजाश्रिता ।। १३४ ।।
अर्थ—राज-राजेश्वरी- जो सम्राटों की भी अधीश्वरी हैं; राज्य-दायिनी- जो राज्य (साम्राज्य) प्रदान करती हैं; राज्य-वल्लभा- जिन्हें अपने समस्त राज्य और उन पर शासन अति प्रिय हैं; राजत्कृपा- जिनकी कृपा सर्वत्र चमकती रहती है; राजपीठ-निवेशित-निजाश्रिता- जो अपने शरणागत भक्तों को राजसिंहासन पर आसीन करती हैं (नाम ६८४-६८८)
श्लोक १३५
राज्यलक्ष्मीः कोशनाथा चतुरङ्ग-बलेश्वरी । साम्राज्य-दायिनी सत्यसन्धा सागरमेखला ।। १३५ ।।
अर्थ— राज्यलक्ष्मीः- जो राज्यलक्ष्मी (ऐश्वर्य एवं समृद्धि) स्वरूपा हैं; कोशनाथा- जो कोशों की स्वामिनी हैं; चतुरङ्ग-बलेश्वरी- जो चतुरंग सेना (मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार रूपी अन्तःकरण की सेना) की अधीश्वरी हैं; साम्राज्य-दायिनी- जो परम साम्राज्य प्रदान करती हैं; सत्यसन्धा- जो सत्य के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ या अटल हैं; सागरमेखला- जो समुद्रों की मेखला (करधनी) धारण करती हैं (नाम ६८९-६९४)
श्लोक १३६
दीक्षिता दैत्यशमनी सर्वलोक-वशङ्करी । सर्वार्थदात्री सावित्री सच्चिदानन्द-रूपिणी ।। १३६ ।।
अर्थ— दीक्षिता- जो भक्त को मन्त्र-दीक्षा या आध्यात्मिक ज्ञान देकर उसके पापों का नाश करती हैं; दैत्यशमनी- जो दैत्यों का शमन (संहार) करती हैं; सर्वलोक-वशङ्करी- जो समस्त लोकों को वश में करती हैं; सर्वार्थदात्री- जो समस्त मनोरथों (कामनाओं) को प्रदान करती हैं; सावित्री- जो समस्त जगत् की सृजन-शक्ति (सावित्री) हैं; सच्चिदानन्द-रूपिणी- जो सत्-चित्-आनन्द स्वरूपा हैं (नाम ६९५-७००)
श्लोक १३७
देश-कालापरिच्छिन्ना सर्वगा सर्वमोहिनी । सरस्वती शास्त्रमयी गुहाम्बा गुह्यरूपिणी ।। १३७ ।।
अर्थ— देश-कालापरिच्छिन्ना- जो देश और काल से परिच्छिन्न (सीमित) नहीं हैं; सर्वगा- जो सर्वव्यापिनी हैं; सर्वमोहिनी- जो अपनी माया से सभी को मोहित कर लेती हैं; सरस्वती- जो ज्ञान-स्वरूपा (सरस्वती) हैं; शास्त्रमयी- जो समस्त शास्त्रों का स्वरूप हैं; गुहाम्बा- जो हृदय की गुहा (गुफा) में निवास करती हैं, जो गुह (कार्तिकेय) की माता हैं; गुह्यरूपिणी- जिनका स्वरूप गूढ़ (गुह्य) है (नाम ७०१-७०७)
श्लोक १३८
सर्वोपाधि-विनिर्मुक्ता सदाशिव-पतिव्रता । सम्प्रदायेश्वरी साध्वी गुरुमण्डल-रूपिणी ।। १३८ ।।
अर्थ— सर्वोपाधि-विनिर्मुक्ता- जो समस्त उपाधियों (सीमाओं और पहचानों) से मुक्त हैं; सदाशिव-पतिव्रता- जो सदाशिव को पूर्णतः समर्पित उनकी अर्धांगिनी हैं; सम्प्रदायेश्वरी- जो आध्यात्मिक सम्प्रदायों (परम्पराओं) की अधीश्वरी हैं; साधु- जिनमें सत्कर्म का सहज गुण विद्यमान है; ई- जो शक्ति प्रणव बीज, 'ई' (कामकला) की स्वरूपा हैं; गुरुमण्डल-रूपिणी- जो गुरुमण्डल (आध्यात्मिक गुरुओं की परंपरा और ऊर्जा) का स्वरूप हैं (नाम ७०८-७१३)
श्लोक १३९
कुलोत्तीर्णा भगाराध्या माया मधुमती मही । गणाम्बा गुह्यकाराध्या कोमलाङ्गी गुरुप्रिया ।। १३९ ।।
अर्थ—कुलोत्तीर्णा- जो कुल (इन्द्रिय-समूह) से परे हैं, अर्थात् इन्द्रियों से अतीत हैं; भगाराध्या- जो सूर्यमण्डल में पूजित हैं; माया- जो माया (भ्रम) स्वरूपा हैं; मधुमती- जो मधु के समान मधुर (मधुमती) हैं; मही- जो पृथ्वी-देवी (मही) हैं; गणाम्बा- जो गणों की माता हैं; गुह्यकाराध्या- जो गुप्त रूप से पूजित हैं; कोमलाङ्गी- जिनका शरीर अति कोमल हैं; गुरुप्रिया- जो समस्त गुरुओं और सिद्दों को प्रिय हैं (नाम ७१४-७२२)
श्लोक १४०
स्वतन्त्रा सर्वतन्त्रेशी दक्षिणामूर्ति-रूपिणी । सनकादि-समाराध्या शिवज्ञान-प्रदायिनी ।। १४० ।।
अर्थ—स्वतन्त्रा- जो पूर्णतः स्वतन्त्र या स्वाधीन हैं; सर्वतन्त्रेशी- जो समस्त तन्त्रों की स्वरूपा हैं; दक्षिणामूर्ति-रूपिणी- जो दक्षिणामूर्ति स्वरूपा हैं; सनकादि-समाराध्या- जिनकी आराधना सनक आदि (ऋषि) करते हैं; शिवज्ञान-प्रदायिनी- जो परम शिव-ज्ञान प्रदान करती हैं (नाम ७२३-७२७)
श्लोक १४१
चित्कलाऽनन्द-कलिका प्रेमरूपा प्रियङ्करी । नामपारायण-प्रीता नन्दिविद्या नटेश्वरी ।। १४१ ।।
अर्थ— चित्कला- जो समस्त देहधारियों के मन में चित् (ब्रह्म) के अंश (कला) रूप में स्थित हैं; आनन्द-कलिका- जो आनन्द की प्रारम्भिक कलिका (अंकुर) हैं; प्रेमरूपा- जो शुद्ध प्रेम-स्वरूपा हैं; प्रियङ्करी- जो प्रेम उत्पन्न करती हैं, क्योंकि वे स्वयं प्रेम की प्रतिमूर्ति हैं; नामपारायण-प्रीता- जो अपने नामों के पारायण (जप) से प्रसन्न होती हैं; नन्दिविद्या- जिनकी उपासना नंदी पंचदशी मन्त्र से होती हैं; नटेश्वरी- जो नटराज की पत्नी हैं (नाम ७२८-७३४)
श्लोक १४२
मिथ्या-जगदधिष्ठाना मुक्तिदा मुक्तिरूपिणी । लास्यप्रिया लयकरी लज्जा रम्भादिवन्दिता ।। १४२ ।।
अर्थ—मिथ्या-जगदधिष्ठाना- जो इस मिथ्या (भ्रामक) जगत् का आधार हैं; मुक्तिदा- जो आवागमन के चक्र से मुक्ति (मोक्ष) प्रदान करती हैं; मुक्तिरूपिणी- जो मुक्ति की साक्षात् मूर्ति हैं; लास्यप्रिया- जिन्हें लास्य (नृत्य) प्रिय है; लयकरी- जो विलय (ध्यान से परे की अवस्था) की कारक हैं; लज्जा- जो लज्जा के रूप में विद्यमान हैं; रम्भादिवन्दिता- जो रम्भा आदि अप्सराओं द्वारा वन्दित हैं (नाम ७३५-७४१)
श्लोक १४३
भवदाव-सुधावृष्टिः पापारण्य-दवानला । दौर्भाग्य-तूलवातूला जराध्वान्त-रविप्रभा ।। १४३ ।।
अर्थ—भवदाव-सुधावृष्टिः- जो संसार रूपी दावानल (वन की अग्नि) को शान्त करने वाली अमृत-वर्षा हैं; पापारण्य-दवानला- जो पाप (अज्ञान) रूपी वन को भस्म करने वाली अग्नि हैं; दौर्भाग्य-तूलवातूला- जो दुर्भाग्य को रूई के समान उड़ा देने वाला प्रचण्ड आँधी के समान हैं; जराध्वान्त-रविप्रभा- जो वृद्धावस्था रूपी अंधकार को दूर करने वाली सूर्य-किरण हैं (नाम ७४२-७४५)
श्लोक १४४
भाग्याब्धि-चन्द्रिका भक्त-चित्तकेकि-घनाघना । रोगपर्वत-दम्भोलिर् मृत्युदारु-कुठारिका ।। १४४ ।।
अर्थ—भाग्याब्धि-चन्द्रिका- जो सौभाग्य के सागर को चन्द्रिका (चाँदनी) के समान उमगा देती हैं; भक्त-चित्तकेकि-घनाघना- जो हर्षित करने वाली उस घनघोर मेघ-माला के समान हैं जिसे देखकर भक्त का चित्त-रूपी मयूर नाचने लगता है; रोगपर्वत-दम्भोलिर्- जो रोग रूपी पर्वत को चूर करने वाली वज्र (दम्भोलि: इंद्र देव का वज्र) के समान हैं; मृत्युदारु-कुठारिका- जो मृत्यु रूपी वृक्ष के लिए कुठार (कुल्हाड़ी) के समान हैं (नाम ७४६-७४९)
श्लोक १४५
महेश्वरी महाकाली महाग्रासा महाशना । अपर्णा चण्डिका चण्डमुण्डासुर-निषूदिनी ।। १४५ ।।
अर्थ—महेश्वरी- जो सर्वोच्च शासिका (महेश्वरी) हैं; महाकाली- जो महाकाली हैं; महाग्रासा- जो संपूर्ण जगत को स्वयं में लीन (ग्रास) कर लेती हैं; महाशना- जो महान भोक्त्री (महाशना) हैं; अपर्णा- जो ऋण (कर्म से संबंधित) का नाश करती हैं, जिन्होंने अपनी कठोर तपस्या के समय पत्तों (पर्ण) के आहार का भी परित्याग किया (अपर्णा—माँ पार्वती); चण्डिका- जो (दुष्टों के प्रति) उग्र (चण्डिका) हैं; चण्डमुण्डासुर-निषूदिनी- जिन्होंने चण्ड और मुण्ड नामक असुरों का संहार किया है (नाम ७५०-७५६)
श्लोक १४६
क्षराक्षरात्मिका सर्व-लोकेशी विश्वधारिणी । त्रिवर्गदात्री सुभगा त्र्यम्बका त्रिगुणात्मिका ।। १४६ ।।
अर्थ—क्षराक्षरात्मिका- जो क्षर और अक्षर दोनों रूपों का मूल स्वरूप हैं; सर्व-लोकेशी- जो समस्त लोकों की ईश्वरी हैं; विश्वधारिणी- जो विश्व को धारण करती हैं; त्रिवर्गदात्री- जो धर्म, अर्थ और काम—तीनों पुरुषार्थ प्रदान करती हैं (ताकि उनका त्याग कर हम मोक्ष की ओर अग्रसर हों); सुभगा- जो परम सौभाग्य और ऐश्वर्य से परिपूर्ण हैं; त्र्यम्बका- जिनके तीन नेत्र हैं; त्रिगुणात्मिका- जो तीनों मूल गुणों का सार-स्वरूप हैं (नाम ७५७-७६३)
श्लोक १४७
स्वर्गापवर्गदा शुद्धा जपापुष्प-निभाकृतिः । ओजोवती द्युतिधरा यज्ञरूपा प्रियव्रता ।। १४७ ।।
अर्थ—स्वर्गापवर्गदा- जो स्वर्ग और मोक्ष दोनों प्रदान करती हैं; शुद्धा- जो परम शुद्ध हैं; जपापुष्प-निभाकृतिः- जिनका स्वरूप और आभा जपा (गुड़हल) के पुष्प के समान है; ओजोवती- जो ओज (तेज) से परिपूर्ण हैं; द्युतिधरा- जो दिव्या कान्ति और प्रकाश धारण करती हैं; यज्ञरूपा- जो यज्ञ-स्वरूपा हैं; प्रियव्रता- जिन्हें व्रत और नियम प्रिय हैं (नाम ७६४-७७०)
श्लोक १४८
दुराराध्या दुराधर्षा पाटली-कुसुम-प्रिया । महती मेरुनिलया मन्दार-कुसुम-प्रिया ।। १४८ ।।
अर्थ—दुराराध्या- जिनकी आराधना कठिन है; दुराधर्षा- जो पूर्णतः अजेय हैं; पाटली-कुसुम-प्रिया- जिन्हें पाटली पुष्प प्रिय हैं; महती- जो महान विश्व-बुद्धि हैं, जिनका एक रूप देवऋषि नारद की वीणा (महती) हैं; मेरुनिलया- जो मेरु पर्वत पर निवास करती हैं; मन्दार-कुसुम-प्रिया- जिन्हें मन्दार के पुष्प प्रिय हैं (नाम ७७१-७७६)
श्लोक १४९
वीराराध्या विराड्रूपा विरजा विश्वतोमुखी । प्रत्यग्रूपा पराकाशा प्राणदा प्राणरूपिणी ।। १४९ ।।
अर्थ—वीराराध्या- जिनका आराधन वीर करते हैं; विराड्रूपा- जो विराट् (समस्त जगत्) का स्वरूप धारण करती हैं; विरजा- जो रजोगुण से रहित हैं; विश्वतोमुखी- जिनके मुख सभी दिशाओं की ओर हैं; प्रत्यग्रूपा- जो अन्तर्मुखी द्रष्टाओं को दृष्टिगोचर होती हैं; पराकाशा- जो परम आकाश स्वरूपा हैं; प्राणदा- जो प्राण की दात्री हैं; प्राणरूपिणी- जो प्राण-स्वरूपा हैं (नाम ७७७-७८४)
श्लोक १५०
मार्ताण्ड-भैरवाराध्या मन्त्रिणीन्यस्त-राज्यधूः । त्रिपुरेशी जयत्सेना निस्त्रैगुण्या परापरा ।। १५० ।।
अर्थ—मार्ताण्ड-भैरवाराध्या- जो मार्ताण्ड-भैरव द्वारा पूजित हैं; मन्त्रिणीन्यस्त-राज्यधूः- जिन्होंने अपना राज्य-भार मन्त्रिणी (श्यामला) को सौंपा है; त्रिपुरेशी- जो तीन पुरों की ईश्वरी (स्वामिनी) हैं; जयत्सेना- जिनकी सेना सदा विजयी रहती है; निस्त्रैगुण्या- जो तीनों गुणों (सत्त्व, रजस और तमस) से परे हैं; परापरा- जो विषय हैं और विषयी भी, जो ज्ञान की समस्त प्रक्रिया का स्वरूप हैं (नाम ७८५-७९०)
श्लोक १५१
सत्य-ज्ञानानन्द-रूपा सामरस्य-परायणा । कपर्दिनी कलामाला कामधुक् कामरूपिणी ।। १५१ ।।
अर्थ—सत्य-ज्ञानानन्द-रूपा- जो सत्य, ज्ञान और आनन्द स्वरूपा हैं; सामरस्य-परायणा- जो एकत्व (सामरस्य) की अवस्था में लीन रहती हैं; कपर्दिनी- जो कपर्द (भगवान शिव) की पत्नी (कपर्दिनी) हैं; कलामाला- जो चौंसठ कलाओं की माला से विभूषित हैं; कामधुक्- जो भक्तों की कामना पूर्ण करने वाली कामधेनु (कामधुक्) हैं; कामरूपिणी- जो कामना (इच्छा) का सार-स्वरूप हैं (नाम ७९१-७९६)
श्लोक १५२
कलानिधिः काव्यकला रसज्ञा रसशेवधिः । पुष्टा पुरातना पूज्या पुष्करा पुष्करेक्षणा ।। १५२ ।।
अर्थ—कलानिधिः- जो समस्त कलाओं की निधि (कोष) हैं; काव्यकला- जो काव्य और कला की अधिष्ठात्री हैं; रसज्ञा- जो रस की ज्ञाता हैं; रसशेवधिः- जो संपूर्ण रसों की निधि (कोष) हैं; पुष्टा- जो पुष्ट (पोषण से परिपूर्ण) हैं; पुरातना- जो अति प्राचीन या आदि हैं; पूज्या- जो परम पूज्य हैं; पुष्करा- जो परिपूर्ण हैं तथा जो पोषण प्रदान करती हैं; पुष्करेक्षणा- जिनके नेत्र कमल के समान हैं (नाम ७९७-८०५)
श्लोक १५३
परंज्योतिः परंधाम परमाणुः परात्परा । पाशहस्ता पाशहन्त्री परमन्त्र-विभेदिनी ।। १५३ ।।
अर्थ—परंज्योतिः- जो सर्वोच्च दिव्य प्रकाश हैं; परंधाम- जो परम धाम (सर्वोच्च आश्रय) हैं; परमाणुः- जो परमाणु से भी सूक्ष्म हैं; परात्परा- जो परात्पर (सबसे परे) हैं; पाशहस्ता- जो हाथ में पाश धारण करती हैं; पाशहन्त्री- जो समस्त बन्धनों (पाशों) को नष्ट करती हैं; परमन्त्र-विभेदिनी- जो सभी दुष्ट या शत्रुतापूर्ण मन्त्रों की माया का भेदन करती हैं (नाम ८०६-८१२)
श्लोक १५४
मूर्ता अमूर्ता अनित्यतृप्ता मुनिमानस-हंसिका । सत्यव्रता सत्यरूपा सर्वान्तर्यामिनी सती ।। १५४ ।।
अर्थ—मूर्ता- जो साकार (मूर्त) हैं; अमूर्ता- जो निराकार (अमूर्त) हैं; अनित्यतृप्ता- जो नश्वर आहुतियों से भी सन्तुष्ट हो जाती हैं; मुनिमानस-हंसिका- जो मुनियों के मन रूपी सरोवर में विवेक रूपी हंसिनी हैं; सत्यव्रता- जो सत्य में दृढ़ता से स्थित हैं; सत्यरूपा- जो सत्य की साक्षात् मूर्ति हैं; सर्वान्तर्यामिनी- जो समस्त प्राणियों के भीतर निवास करती हैं; सती- जो माँ सती हैं, जो शाश्वत हैं (नाम ८१३-८२०)
श्लोक १५५
ब्रह्माणी ब्रह्मजननी बहुरूपा बुधार्चिता । प्रसवित्री प्रचण्डाऽज्ञा प्रतिष्ठा प्रकटाकृतिः ।। १५५ ।।
अर्थ—ब्रह्माणी- जो ब्रह्म की शक्ति हैं; ब्रह्म- जो स्वयं ब्रह्म हैं; जननी- जो जगत् की जननी (माता) हैं; बहुरूपा- जो अनेक रूपों में प्रकट होती हैं; बुधार्चिता- जो विद्वानों (बुद्धिजीवियों) द्वारा पूजी जाती हैं; प्रसवित्री- जिन्होंने सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न किया; प्रचण्डा- जो प्रचण्ड (उग्र) हैं; आज्ञा- जो दिव्य आज्ञा स्वरूपा हैं; प्रतिष्ठा- जो समस्त सृष्टि की प्रतिष्ठा (आधार) हैं; प्रकटाकृतिः- जो विश्व का प्रकट रूप हैं (नाम ८२१-८३०)
श्लोक १५६
प्राणेश्वरी प्राणदात्री पञ्चाशत्पीठ-रूपिणी । विश‍ृङ्खला विविक्तस्था वीरमाता वियत्प्रसूः ।। १५६ ।।
अर्थ—प्राणेश्वरी- जो प्राणों की अधीश्वरी हैं; प्राणदात्री- जो प्राण प्रदान करने वाली हैं; पञ्चाशत्पीठ-रूपिणी- जो पचास पीठों (शक्तिपीठों) के रूप में स्थित हैं; विश‍ृङ्खला- जो बन्धनरहित हैं; विविक्तस्था- जो एकान्त (विविक्त) स्थानों में निवास करती हैं; वीरमाता- जो वीरों की माता हैं (श्रीगणेश का एक नाम 'वीर' भी हैं); वियत्प्रसूः- जो आकाश या संपूर्ण शून्य को उत्पन्न करने वाली हैं (नाम ८३१-८३७)
श्लोक १५७
मुकुन्दा मुक्तिनिलया मूलविग्रह-रूपिणी । भावज्ञा भवरोगघ्नी भवचक्र-प्रवर्तिनी ।। १५७ ।।
अर्थ—मुकुन्दा- जो मोक्ष प्रदान करती हैं; मुक्तिनिलया- जो मुक्ति का धाम (निवास) हैं; मूलविग्रह-रूपिणी- जिनका स्वरूप समस्त सृष्टि का मूल (आधार) है; भावज्ञा- जो भाव (विचार) की ज्ञाता हैं; भवरोगघ्नी- जो जन्म-मरण रूपी भव-रोग का नाश करती हैं; भवचक्र-प्रवर्तिनी- जो संसार-चक्र का प्रवर्तन (लागू) करती हैं (नाम ८३८-८४३)
श्लोक १५८
छन्दः सारा शास्त्रसारा मन्त्रसारा तलोदरी । उदारकीर्तिर् उद्दाम-वैभवा वर्णरूपिणी ।। १५८ ।।
अर्थ—छन्दःसारा- जो छन्दों का सार हैं; शास्त्रसारा- जो शास्त्रों का सार हैं; मन्त्रसारा- जो मन्त्रों का सार हैं; तलोदरी- जिनका उदर अति कृश (पतली कमर वाली) है; उदारकीर्तिः- जिनकी कीर्ति अति उन्नत है; उद्दाम-वैभवा- जिनका वैभव असीम है; वर्णरूपिणी- जो अक्षरों (वर्णों) के रूप में विद्यमान हैं (नाम ८४४-८५०)
श्लोक १५९
जन्ममृत्यु-जरातप्त-जनविश्रान्ति-दायिनी । सर्वोपनिष-दुद्-घुष्टा शान्त्यतीत-कलात्मिका ।। १५९ ।।
अर्थ—जन्ममृत्यु-जरातप्त-जनविश्रान्ति-दायिनी- जो जन्म, वृद्धावस्था और मृत्यु से सन्तप्त जनों को विश्रान्ति (शान्ति) प्रदान करती हैं; सर्वोपनिष-दुद्-घुष्टा- जिनकी कीर्ति समस्त उपनिषदों में व्यापत है; शान्त्यतीत-कलात्मिका- जो शान्ति से भी परे की अवस्था (शांत्यतीत कला) की स्वामिनी हैं (नाम ८५१-८५३)
श्लोक १६०
गम्भीरा गगनान्तस्था गर्विता गानलोलुपा । कल्पना-रहिता काष्ठाऽकान्ता कान्तार्ध-विग्रहा ।। १६० ।।
अर्थ—गम्भीरा- जो अत्यंत गम्भीर और गहरी हैं, जिनकी थाह पाना संभव नहीं; गगनान्तस्था- जो गगन में स्थित हैं; गर्विता- जो 'अहं' चेतना स्वरूपा हैं; गानलोलुपा- जो संगीत में आनन्द लेती हैं; कल्पना-रहिता- जो कल्पना (काल्पनिक गुणों) से रहित हैं, अर्थात्, स्वयं परम सत्य हैं; काष्ठा- जो परम लक्ष्य, सर्वोच्च अवस्था हैं; अकान्ता- जो समस्त पापों का अन्त करती हैं ; कान्तार्ध-विग्रहा- जो भगवान शिव के अर्ध शरीर को धारण करती हैं (नाम ८५४-८६१)
श्लोक १६१
कार्यकारण-निर्मुक्ता कामकेलि-तरङ्गिता । कनत्कनकता-टङ्का लीला-विग्रह-धारिणी ।। १६१ ।।
अर्थ—कार्यकारण-निर्मुक्ता- जो कार्य-कारण (कर्म के बन्धन) से मुक्त हैं; कामकेलि-तरङ्गिता- जो भगवान शिव के सान्निध्य में काम-केलि से तरंगित होती हैं; कनत्कनकता-टङ्का- जो देदीप्यमान स्वर्ण के कर्णफूल (टंक) धारण करती हैं; लीला-विग्रह-धारिणी- जो केवल लीला हेतु विविध रूप धारण करती हैं (नाम ८६२-८६५)
श्लोक १६२
अजा क्षयविनिर्मुक्ता मुग्धा क्षिप्र-प्रसादिनी । अन्तर्मुख-समाराध्या बहिर्मुख-सुदुर्लभा ।। १६२ ।।
अर्थ—अजा- जो अजन्मी हैं; क्षयविनिर्मुक्ता- जो क्षय से मुक्त हैं; मुग्धा- जो मनोहारिणी (मुग्धा) हैं; क्षिप्र-प्रसादिनी- जो शीघ्र प्रसन्न हो जाती हैं; अन्तर्मुख-समाराध्या- जो अन्तर्मुख होकर (भीतर) पूजित होती हैं; बहिर्मुख-सुदुर्लभा- जो बहिर्मुख जनों (बाह्य विषयों में लिप्त लोग) के लिए अति दुर्लभ हैं (नाम ८६६-८७१)
श्लोक १६३
त्रयी त्रिवर्गनिलया त्रिष्ठा त्रिपुरमालिनी । निरामया निरालम्बा स्वात्मारामा सुधासृतिः ।। १६३ ।।
अर्थ—त्रयी- जो तीन वेदों में साक्षात रूप में प्रकट होती हैं; त्रिवर्गनिलया- जो तीनों पुरुषार्थों का निवास-स्थान हैं; त्रिष्ठा- जो त्रिकोणों (त्रयों) में स्थित हैं; त्रिपुरमालिनी- जो श्रीचक्र के षष्ठ आवरण की अधिष्ठात्री देवी (त्रिपुरमालिनी) हैं; निरामया- जो सभी प्रकार के रोगों और विकारों से रहित हैं; निरालम्बा- जो किसी पर आश्रित नहीं; स्वात्मारामा- जो अपनी आत्मा में ही रमण करती हैं; सुधासृतिः- जो अमृत की स्रोत हैं (नाम ८७२-८७९)
श्लोक १६४
संसारपङ्क-निर्मग्न-समुद्धरण-पण्डिता । यज्ञप्रिया यज्ञकर्त्री यजमान-स्वरूपिणी ।। १६४ ।।
अर्थ—संसारपङ्क-निर्मग्न-समुद्धरण-पण्डिता- जो संसार (मोह माया) रूपी कीचड़ में डूबे या धंसे हुए जनों का उद्धार करने में परम कुशल हैं; यज्ञप्रिया- जिनको यज्ञ (और अनुष्ठान) प्रिय हैं; यज्ञकर्त्री- जो सभी यज्ञों को संचालित और संपन्न करने वाली हैं; यजमान-स्वरूपिणी- जो यजमान-स्वरूपा हैं (नाम ८८०-८८३)
श्लोक १६५
धर्माधारा धनाध्यक्षा धनधान्य-विवर्धिनी । विप्रप्रिया विप्ररूपा विश्वभ्रमण-कारिणी ।। १६५ ।।
अर्थ—धर्माधारा- जो धर्म का आधार हैं; धनाध्यक्षा- जो धन की अध्यक्षा (स्वामिनी) हैं; धनधान्य-विवर्धिनी- जो धन और धान्य की वृद्धि करती हैं; विप्रप्रिया- जो विप्रों (आत्मज्ञानी विद्वानों) को प्रिय मानती हैं; विप्ररूपा- जो आत्मज्ञानी (विप्र) के रूप में हैं; विश्वभ्रमण-कारिणी- जो अपनी माया से विश्व को भ्रमण कराती हैं (नाम ८८४-८८९)
श्लोक १६६
विश्वग्रासा विद्रुमाभा वैष्णवी विष्णुरूपिणी । अयोनिर् योनिनिलया कूटस्था कुलरूपिणी ।। १६६ ।।
अर्थ—विश्वग्रासा- जो विश्व का ग्रास (संहार) करती हैं; विद्रुमाभा- जो मूँगे (विद्रुम) के समान लाल आभा से दीप्त हैं; वैष्णवी- जो श्रीविष्णु की शक्ति (वैष्णवी) हैं; विष्णुरूपिणी- जो विष्णु-स्वरूपा हैं; अयोनिः- जो उत्पत्ति-रहित (अयोनि) हैं; योनिनिलया- जो समस्त उत्पत्ति का मूल स्थान हैं; कूटस्था- जो अपने स्वरूप को आवृत (ढक कर) रखती हैं; कुलरूपिणी- जो कौल मार्ग की देवी हैं (नाम ८९०-८९७)
श्लोक १६७
वीरगोष्ठीप्रिया वीरा नैष्कर्म्या नादरूपिणी । विज्ञानकलना कल्या विदग्धा बैन्दवासना ।। १६७ ।।
अर्थ—वीरगोष्ठीप्रिया- जिन्हें वीरों की गोष्ठी (सभा) प्रिय है; वीरा- जो स्वयं पराक्रमी हैं; नैष्कर्म्या- जो कर्म से रहित हैं; नादरूपिणी- जो आदि नाद (मूल ध्वनि) स्वरूपा हैं; विज्ञानकलना- जो ब्रह्म-साक्षात्कार हेतु परम ज्ञान प्रदान करती हैं; कल्या- जो सृष्टि में समर्थ एवं कुशल हैं; विदग्धा- जो सब विषयों में निपुण हैं; बैन्दवासना- जो बिन्दु पर आसीन हैं (नाम ८९८-९०५)
श्लोक १६८
तत्त्वाधिका तत्त्वमयी तत्त्वमर्थ-स्वरूपिणी । सामगानप्रिया सौम्या सदाशिव-कुटुम्बिनी ।। १६८ ।।
अर्थ—तत्त्वाधिका- जो तत्त्वों से भी परे हैं; तत्त्वमयी- जो स्वयं समस्त तत्त्व हैं; तत्त्वमर्थ-स्वरूपिणी- जो महावाक्यों का स्वरूप हैं, 'तत्' और 'त्वम्' का अर्थ-स्वरूप हैं; सामगानप्रिया- जिन्हें सामवेद के गान प्रिय हैं; सौम्या- जो सौम्य एवं शान्त हैं; सदाशिव-कुटुम्बिनी- जो सदाशिव की प्रिय सहधर्मिणी हैं (नाम ९०६-९११)
श्लोक १६९
सव्यापसव्य-मार्गस्था सर्वापद्विनिवारिणी । स्वस्था स्वभावमधुरा धीरा धीरसमर्चिता ।। १६९ ।।
अर्थ—सव्यापसव्य-मार्गस्था- जो सव्य' (दाएँ) और 'अपसव्य' (बाएँ) दोनों मार्गों से प्राप्य हैं; सर्वापद्विनिवारिणी- जो समस्त आपत्तियों का निवारण करती हैं; स्वस्था- जो अपने स्वरूप में स्थित, स्वतन्त्र (स्वस्था) हैं; स्वभावमधुरा- जिनका स्वभाव मधुर है; धीरा- जो धैर्यवती हैं; धीरसमर्चिता- जो धीर (विवेकी) जनों द्वारा सम्यक् पूजित हैं (नाम ९१२-९१७)
श्लोक १७०
चैतन्यार्घ्य-समाराध्या चैतन्य-कुसुमप्रिया । सदोदिता सदातुष्टा तरुणादित्य-पाटला ।। १७० ।।
अर्थ—चैतन्यार्घ्य-समाराध्या- जो चैतन्य रूपी अर्घ्य से पूजित हैं; चैतन्य-कुसुमप्रिया- जिन्हें चेतना रूपी पुष्प अत्यधिक प्रिय है; सदोदिता- जो सदा जागृत और प्रकाशमान हैं; सदातुष्टा- जो सदा सन्तुष्ट रहती हैं; तरुणादित्य-पाटला- जिनकी आभा प्रातःकालीन सूर्य के समान गुलाबी या लालिमा (पाटला) लिए हुए है (नाम ९१८-९२२)
श्लोक १७१
दक्षिणा-दक्षिणाराध्या दरस्मेर-मुखाम्बुजा । कौलिनी-केवलाऽनर्घ्य-कैवल्य-पददायिनी ।। १७१ ।।
अर्थ—दक्षिणा-दक्षिणाराध्या- जो दक्षिण और वाम—दोनों मार्गों के साधकों द्वारा पूजित हैं; दरस्मेर-मुखाम्बुजा- जिनका मुखारविंद मन्द मुस्कान से खिला है; कौलिनी-केवला- जो कौल साधकों द्वारा पूजित शुद्ध ज्ञान की अदिष्ठात्री देवी हैं; अनर्घ्य-कैवल्य-पददायिनी- जो मोक्ष का अमूल्य पद प्रदान करती हैं (नाम ९२३-९२६)
श्लोक १७२
स्तोत्रप्रिया स्तुतिमती श्रुति-संस्तुत-वैभवा । मनस्विनी मानवती महेशी मङ्गलाकृतिः ।। १७२ ।।
अर्थ—स्तोत्रप्रिया- जिन्हें स्तोत्र प्रिय हैं; स्तुतिमती- जो समस्त स्तुति की पात्र एवं सार-स्वरूपा हैं; श्रुति-संस्तुत-वैभवा- जिनकी महिमा श्रुतियों (शास्त्रों) में कीर्तित है; मनस्विनी- जो अपने मन की स्वामिनी हैं ; मानवती- जो उच्च मनोभाव (विचार) वाली हैं; महेशी- जो महेश (भगवान शिव) की पत्नी (महेशी) हैं; मङ्गलाकृतिः- जिनका स्वरूप मंगलमय है (नाम ९२७-९३३)
श्लोक १७३
विश्वमाता जगद्धात्री विशालाक्षी विरागिणी । प्रगल्भा परमोदारा परामोदा मनोमयी ।। १७३ ।।
अर्थ—विश्वमाता- जो विश्व की माता हैं; जगद्धात्री- जो जगत् को धारण करने वाली हैं; विशालाक्षी- जिनके नेत्र विशाल हैं; विरागिणी- जो विरक्त (वैराग्यमयी) हैं; प्रगल्भा- जो साहसी एवं आत्मविश्वासी (प्रगल्भा) हैं; परमोदारा- जो परम उदार हैं; परामोदा- जो परम आनन्दमयी हैं; मनोमयी- जो मन-स्वरूपा, मन के रूप में विराजमान हैं (नाम ९३४-९४१)
श्लोक १७४
व्योमकेशी विमानस्था वज्रिणी वामकेश्वरी । पञ्चयज्ञ-प्रिया पञ्च-प्रेत-मञ्चाधिशायिनी ।। १७४ ।।
अर्थ—व्योमकेशी- जिनके केश आकाश-स्वरूप हैं; विमानस्था- जो दिव्य विमान (श्री चक्र) में विराजमान हैं; वज्रिणी- जो वज्र धारण करती हैं; वामकेश्वरी- जो वाम मार्ग की अधिष्ठात्री देवी हैं; पञ्चयज्ञ-प्रिया- जिन्हें पंच-यज्ञ प्रिय हैं; पञ्च-प्रेत-मञ्चाधिशायिनी- जो पंच-प्रेतों (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईशान और सदाशिव) से बने आसन पर शयन करती हैं (नाम ९४२-९४७)
श्लोक १७५
पञ्चमी पञ्चभूतेशी पञ्च-संख्योपचारिणी । शाश्वती शाश्वतैश्वर्या शर्मदा शम्भुमोहिनी ।। १७५ ।।
अर्थ—पञ्चमी- जो सदाशिव की पत्नी, पंच-ब्रह्मों में पंचमी (पञ्चमी) हैं; पञ्चभूतेशी- जो पंच-भूतों (पाँच तत्त्वों) की ईश्वरी हैं; पञ्च-संख्योपचारिणी- जो पाँच उपचारों से पूजित होती हैं; शाश्वती- जो शाश्वत हैं; शाश्वतैश्वर्या- जो शाश्वत ऐश्वर्य की साक्षात् मूर्ति हैं; शर्मदा- जो परम आनंद और सुख प्रदान करती हैं; शम्भुमोहिनी- जो भगवान शिव को मोहित करने वाली हैं (नाम ९४८-९५१)
श्लोक १७६
धराधरसुता धन्या धर्मिणी धर्मवर्धिनी । लोकातीता गुणातीता सर्वातीता शमात्मिका ।। १७६ ।।
अर्थ—धरा- जो पृथ्वी-स्वरूपा (धरा) हैं; धरसुता- जो हिमालय, पर्वत पुत्री हैं जो पृथ्वी को धारण करते हैं; धन्या- जो सौभाग्यशालिनी और भक्तों को धन्य करने वाली हैं; धर्मिणी- जो धर्मपरायणा हैं; धर्मवर्धिनी- जो धर्म की वृद्धि करती हैं; लोकातीता- जो समस्त लोकों से परे हैं; गुणातीता- जो तीनों गुणों से परे हैं; सर्वातीता- जो सबसे परे या सर्वोच्च हैं; शमात्मिका- जो शान्ति और आनन्द स्वरूपा हैं (नाम ९५५-९६३)
श्लोक १७७
बन्धूक-कुसुमप्रख्या बाला लीलाविनोदिनी । सुमङ्गली सुखकरी सुवेषाढ्या सुवासिनी ।। १७७ ।।
अर्थ—बन्धूक-कुसुमप्रख्या- जो बन्धूक पुष्प के समान आभा वाली हैं; बाला- जो अपनी बाल-सुलभ निश्छलता में मनोहारी हैं; लीलाविनोदिनी- जो सृष्टि की अपनी लीला का आनन्द लेती हैं; सुमङ्गली- जो सदा मंगलमयी हैं; सुखकरी- जो सुख प्रदान करती हैं; सुवेषाढ्या- जो सुन्दर वस्त्रों से सुसज्जित, मनोहर लगती हैं; सुवासिनी- जो सदा सौभाग्यवती/विवाहिता हैं (नाम ९६४-९७०)
श्लोक १७८
सुवासिन्यर्चन-प्रीता शोभना शुद्धमानसा । बिन्दु-तर्पण-सन्तुष्टा पूर्वजा त्रिपुराम्बिका ।। १७८ ।।
अर्थ—सुवासिन्यर्चन-प्रीता- जो सुवासिनियों (सौभाग्यवती स्त्रियों) की अर्चना से प्रसन्न होती हैं; शोभना- जो अति सुन्दर (शोभना) हैं; शुद्धमानसा- जो शुद्ध मन वाली हैं; बिन्दु-तर्पण-सन्तुष्टा- जो बिन्दु पर अर्पित तर्पण से सन्तुष्ट होती हैं; पूर्वजा- जो सर्वप्रथम अभिव्यक्ति व सर्वाधिक प्राचीन हैं; त्रिपुराम्बिका- जो त्रिपुरों की माता (त्रिपुराम्बिका) हैं (नाम ९७१-९७६)
श्लोक १७९
दशमुद्रा-समाराध्या त्रिपुराश्री-वशङ्करी । ज्ञानमुद्रा ज्ञानगम्या ज्ञानज्ञेय-स्वरूपिणी ।। १७९ ।।
अर्थ—दशमुद्रा-समाराध्या- जो दश मुद्राओं से पूजित होती हैं; त्रिपुराश्री-वशङ्करी- जो त्रिपुरा की अधीश्वरी (श्रीवशंकरी) हैं; ज्ञानमुद्रा- जो ज्ञान-मुद्रा स्वरूपा हैं; ज्ञानगम्या- जो ज्ञान के द्वारा प्राप्य हैं; ज्ञानज्ञेय-स्वरूपिणी- जो ज्ञान और ज्ञेय—दोनों की स्वरूपा हैं (नाम ९७७-९८१)
श्लोक १८०
योनिमुद्रा त्रिखण्डेशी त्रिगुणाम्बा त्रिकोणगा । अनघाऽद्भुत-चारित्रा वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी ।। १८० ।।
अर्थ—योनिमुद्रा- जो योनिमुद्रा-स्वरूपा हैं; त्रिखण्डेशी- जो त्रिखण्ड की अधीश्वरी (त्रिखण्डेशी) हैं; त्रिगुणा- जो तीनों गुणों से युक्त (त्रिगुणा) हैं; अम्बा- जो जगत् की माता (अम्बा) हैं; त्रिकोणगा- जो श्री चक्र के त्रिकोण में निवास करती हैं; अनघा- जो निष्पाप हैं; अद्भुत-चारित्रा- जिनकी लीलाएं तथा कार्य अत्यंत अद्भुत और रहस्यमयी हैं; वाञ्छितार्थ-प्रदायिनी- जो समस्त वांछित अर्थों (कामनाओं) को प्रदान करती हैं (नाम ९८२-९८९)
श्लोक १८१
अभ्यासातिशय-ज्ञाता षडध्वातीत-रूपिणी । अव्याज-करुणा-मूर्तिर अज्ञान-ध्वान्त-दीपिका ।। १८१ ।।
अर्थ—अभ्यासातिशय-ज्ञाता- जो निरन्तर अभ्यास (साधना) के द्वारा जानी जाती हैं; षडध्वातीत-रूपिणी- जो षट्-अध्वाओं (छह मार्गों) से परे की स्वरूपा हैं; अव्याज-करुणा-मूर्तिः- जो निष्पक्ष (अहैतुकी) करुणा की साक्षात् मूर्ति हैं; अज्ञान-ध्वान्त-दीपिका- जो अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाली दीपिका हैं (नाम ९९०-९९३)
श्लोक १८२
आबाल-गोप-विदिता सर्वानुल्लङ्घ्य-शासना । श्रीचक्रराज-निलया श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी ।। १८२ ।।
अर्थ—आबाल-गोप-विदिता- जो बालकों और गोपों तक—सभी के द्वारा भली-भाँति जानी जाती हैं; सर्वानुल्लङ्घ्य-शासना- जिनके शासन (आज्ञा) का कोई उल्लंघन नहीं कर सकता; श्रीचक्रराज-निलया- जो चक्रों के राजा श्रीचक्र में निवास करती हैं; श्रीमत्-त्रिपुरसुन्दरी- जो श्री त्रिपुरसुन्दरी देवी हैं (नाम ९९४-९९७)
समापन
श्रीशिवा शिव-शक्त्यैक्य-रूपिणी ललिताम्बिका । ॐ ।।
अर्थ—श्रीशिवा- जो मंगलमयी शिवा (देवी) हैं; शिव-शक्त्यैक्य-रूपिणी- जो शिव और शक्ति की एकता का स्वरूप हैं; ललिताम्बिका- जो दिव्य माँ ललिता (ललिताम्बिका) हैं (नाम ९९८-१०००)

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